छत्रीबाग स्थित रामद्वारा पर गोस्वामी तुलसीदास की 529वीं जयंती पर आयोजित धर्मसभा में आशीर्वचन

इन्दौर गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस जैसे कालजयी ग्रन्थ की रचना ऐसे मुश्किल समय में की, जब धर्म और संस्कृति की बात करना भी अपराध माना जाता था। उन्होंने अपनी रचना से सोये हुए हिन्दू समाज को न केवल जागृत बनाया बल्कि संगठित और चैतन्य भी बनाने की ऊर्जा प्रदान की। यह गोस्वामी तुलसीदास का ही पुण्य प्रताप था कि बिखरा और सोया हुआ समाज एकजुट होकर धर्म एवं राष्ट्र के प्रति जिम्मेदार बना। यदि तुलसीदास ने नहीं चेताया होता तो आज समाज की तस्वीर कुछ और ही होती।
छत्रीबाग रामद्वारा पर चल रहे चातुर्मास महोत्सव में बुधवार को भारतीय सनातन संस्कृति के संवाहक गोस्वामी तुलसीदास की 529वीं जयंती पर रामस्नेही संप्रदाय के संत हर्षराम महाराज तालवाले ने उक्त प्रेरक बातें कही। ट्रस्ट के देवेन्द्र मुछाल, लक्ष्मीकुमार मुछाल एवं रामसहाय विजयवर्गीय ने बताया कि सभा का शुभारंभ संत हर्षराम एवं न्यासी मंडल के सदस्यों द्वारा गोस्वामी तुलसीदास के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। प्रारम्भ में रामनिवास मोड, वासुदेव सोलंकी, सुरेश काकानी, भूरा पहलवान, हेमंत काकानी, प्रो दिलीप जोशी, रामकृष्ण सेठिया, श्याम भूतड़ा एवं राजेंद्र असावा ने संतश्री का स्वागत किया। इस मौके पर सैकड़ों भक्तों को राम नाम लेखन की पुस्तिकाएँ निशुल्क भेंट की गई। चातुर्मास में 23 अक्टूबर तक प्रतिदिन सुबह 8.30 से 9.30 बजे तक संतश्री के प्रवचन होंगे।
संत हर्षराम ने कहा कि स्वयं गोस्वामी तुलसीदास ने रामायण की रचना के दौरान अनेक अपमान सहन किए लेकिन अपनी भक्ति और श्रद्धा से विचलित नहीं हुए। तत्कालीन समय में रामायण जैसे अनुपम ग्रन्थ की रचना करना बहुत बड़े साहस का काम था जिसे गोस्वामी जी ने पूरी लगन और शिद्धत से पूरा कर दिखाया। आज भी देश के गाँव-गाँव और गली-गली में रामायण की चौपाइयां गूंज रही है तो इसके पीछे गोस्वामी तुलसीदास का समर्पण भाव और लेखन का करिश्मा ही है कि अनपढ़ लोग भी रामायण की पंक्तियों को बिना किसी मदद के कंठाग्र रखते हैं। ऐसे कालजयी गोस्वामी तुलसीदास के प्रति वर्तमान पीढ़ी को कृतज्ञ होना चाहिए।
