
तिलक नगर क्षेत्र के कृषि विहार उद्यान में चल रहे शिवपुराण ज्ञान यज्ञ में धूमधाम से मना शिव-पार्वती विवाह का उत्सव
इंदौर शिव और पार्वती का विवाह श्रद्धा और विश्वास का समन्वय है। हम गृहस्थ लोगों के बीच भी श्रृद्धा और विश्वास की बुनियाद पर ही गृहस्थी की गाड़ी आगे बढ़ती है। हम सबका जीवन श्रद्धा और विश्वास रूपी दो स्तंभों पर टिका है। किस व्यक्ति में कितनी श्रद्धा है या किस पर कितना विश्वास किया जाए इसको मापने का कोई पैमाना नहीं है। कलियुग में श्रद्धा के नाम पर पाखंड और प्रदर्शन की अधिकता देखने को मिलती है।
तिलक नगर क्षेत्र के कृषि विहार उद्यान स्थित श्री पीपलेश्वर महादेव मंदिर पर चल रही शिव महापुराण कथा में श्रीधाम वृन्दावन के प्रख्यात आचार्य पं. शिवेंद्र कृष्ण शास्त्री ने शिव-पार्वती विवाह उत्सव की व्याख्या के दौरान उक्त दिव्य विचार व्यक्त किए। कथा में शनिवार को शिव-पार्वती विवाह का उत्सव भी धूमधाम से मनाया गया। मनोहारी भजनों पर सैकड़ों श्रद्धालु थिरकते रहे। कथा शुभारंभ के पूर्व यजमान समूह की ओर से पिंटू नामदेव-नीता मिश्रा, अनिल-सुनीता देशमुख, अनिल-भावना जाट, विजय-सीमा मिश्रा, अभिनय-रचना सोनकर, प्रवीण-कृष्णा पुरोहित, अनीश-पिंकी पाण्डेय आदि ने व्यासपीठ का पूजन किया। विद्वान वक्ता की अगवानी संजय खादीवाला, छत्रपाल सोलंकी एवं विजय मिश्रा सहित सैकड़ों श्रद्धालुओं ने की और शिवपुराण का पूजन भी किया। संयोजक पिंटू नामदेव ने बताया कि पं. शिवेंद्र कृष्ण शास्त्री 25 अगस्त तक यहाँ प्रतिदिन दोपहर 3 से शाम 6 बजे तक शिवपुराण कथामृत की वर्षा करेंगे। कथा के दौरान कार्तिकेय जन्म प्रसंग, तुलसी-जालंधर कथा, शिवरात्रि व्रत कथा सहित भगवान शिवाशिव की आराधना से जुड़े विभिन्न प्रसंगों की संगीतमय व्याख्या होगी। कथा में विभिन्न उत्सव भी मनाए जाएँगे।
पं. शास्त्री ने शिव-पार्वती विवाह प्रसंग की व्याख्या करते हुए कहा कि शिव-पार्वती का विवाह चैत्र मास, शुक्ल पक्ष, त्रयोदशी, पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में हरिद्वार के कनखल में हुआ। आज भी वहां स्नान करने पर कुवांरी कन्याओं के विवाह जल्द हो जाते हैं। हमारे धर्म स्थल जाने-अनजाने में हुए अनुचित एवं पाप सम्मत कर्मों से मुक्ति के माध्यम हैं, लेकिन आजकल लोग तीर्थ यात्रा भी पिकनिक की तरह करने लगे हैं। हम जब तक नर में नारायण के दर्शन का भाव नहीं रखेंगे तब तक हमारी साधना अधूरी ही रहेगी। गंगा में स्नान से सब तरह के पापों से मुक्ति हो सकती है, लेकिन हम रोज पाप करें और रोज गंगा में डुबकी लगाकर पाप मुक्त हो जाएं, यह भी संभव नहीं है। लोग तीर्थ भी जाते हैं तो धर्म का भाव कम, पिकनिक का भाव ज्यादा होता है। तीर्थ स्थलों पर भी लोग ऐसा व्यवहार करते हैं, जो हमारी संस्कृति और परंपरा को लांछित करने वाला होता है। इसे सुधारने की जरूरत है। प्रकृति को नाराज कर हम प्रसन्न नहीं रह सकते।
