
दलाल बाग पर सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में चल रही चातुर्मासिक धर्मसभा में आशीर्वचन
इंदौर
परिवार के सदस्यों से प्रेम करना गलत नहीं है लेकिन परिवार के मोह में सत्य, न्याय और दूसरों के हितों की उपेक्षा करना संकुचित दृष्टि का परिचायक है। संसार के अनेक सम्बन्धों में हमारी अपेक्षाएं जुडी रहती हैं। जब तक अपेक्षाएं पूरी होती हैं तब तक तो संबंध मधुर बने रहते हैं लेकिन जैसे ही अपेक्षाएं टूटने लगती हैं, हमारे व्यवहार में बदलाव आने लगता है। यहाँ तक कि जो माता-पिता अपनी संतान के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर देते हैं, उन्हीं माता-पिता को कुछ संतानें सफल होने के बाद बोझ समझने लगती हैं। अपनी शक्ति को स्वार्थ में नहीं, परमार्थ में लगाएं, यही दुर्लभ मनुष्य जीवन की धन्यता होगी।
संत शिरोमणि प.पू. विद्यासागर म.सा. के परम प्रभावक शिष्य और राष्ट्रसंत मुनि पुंगव प.पू. श्री सुधासागर महाराज ने शनिवार को सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में वीआईपी रोड स्थित किला मैदान, दलाल बाग परिसर में निर्मित विद्या-सुधा मंडप में चल रहे चातुर्मास महोत्सव में आयोजित नियमित धर्मसभा में उपस्थित साधकों को संबोधित करते हुए उक्त दिव्य और प्रेरक विचार व्यक्त किए। धर्मसभा का शुभारंभ मंगलाचरण एवं पाद प्रक्षालन के साथ हुआ। इस अवसर पर देशभर से आए साधकों की अगवानी चातुर्मास के चक्रवती अध्यक्ष नवीन-शिवानी गोधा, सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद गोधा, चक्रवर्ती मनीष गोधा, महोत्सव अध्यक्ष अशोक डोसी, महामंत्री हर्ष जैन, विजय पाटोदी, आकाश कोयला, प्रिंसपाल टोंग्या, संजय पाटोदी, सौरभ बडजात्या, राहुल सेठी एवं भूपेंद्र भोपाली सहित अनेक सहयोगी बंधुओं ने की।
राष्ट्रसंत ने अपने आशीर्वचन में कहा कि हमारी आँखे, कान, हाथ, पैर, वाणी, विचार और धन – ये सभी दूसरों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के साधन बन सकते हैं। किसी दुखी की बात सुनना, जरुरतमन्द की सहायता करना, शिक्षा एवं चिकित्सा में सहयोग देना और जीवों के प्रति करुणा रखना हमारी शक्तियों का सार्थक उपयोग होगा। साधु जीवन का उद्देश्य केवल घर छोड़ना नहीं, बल्कि मोह और स्वार्थ की सीमाओं से ऊपर उठकर व्यापक कल्याण के लिए स्वयं को समर्पित करना है। राष्ट्रसंत ने साधकों से पूछा कि ग्रहस्थ और साधु के पास वही आंखे, वही कान और वही मस्तिष्क है, फिर भी दोनों की दृष्टि में अंतर क्या है। उन्होंने समझाया कि अंतर शरीर का नहीं बल्कि संकल्प और जीवन के उदेश्य का है। गृहस्थ अपने परिवार, व्यापार, मित्रों और रिश्तेदारों के सुख-दुःख के बारे में सोचना चाहता है जबकि साधु अपने त्याग, संयम और करुणा के माध्यम से समस्त जीवों के कल्याण की भावना रखता है। राष्ट्रसंत ने महाभारत की गांधारी का उदाहरण देते हुए कहा कि किसी एक व्यक्ति के मोह में अपनी पूरी दृष्टि और शक्ति को केन्द्रित कर देना उचित नहीं है। मनुष्य के भीतर अपार शक्ति है लेकिन जब वह अपनी सोच, संकल्प और सामर्थ्य को केवल अपने परिवार एवं निजी स्वार्थ तक सीमित कर लेता है तब उसकी व्यापक संभावनाएं संकुचित हो जाती हैं।
