कण-कण में कृष्ण और रोम-रोम में राम, राम और कृष्ण के
बिना भारत भूमि की कल्पना भी संभव नहीं- पं. ऋषभदेव

इंदौर, 28 अक्टूबर। कृष्ण यदि हमारे देश के कण-कण में मौजूद हैं तो राम भी रोम-रोम में व्याप्त हैं। राम और कृष्ण इस देश के जनमानस के प्राणतत्व हैं। राम मर्यादा पुरूषोतम हैं तो कृष्ण लीलाधर। राम और कृष्ण भारत भूमि के पर्याय हैं। इन दोनों अवतारों के बिना भारतभूमि की कल्पना भी संभव नहीं है। राम ने जहां समाज को अंत्योदय का संदेश दिया है वहीं कृष्ण ने कंस प्रवृत्ति का नाश किया है। धर्म की जब-जब हानि होती है, भगवान भारत भूमि पर ही अवतार लेते हैं।
ये प्रेरक विचार हैं बालव्यास भागवताचार्य पं. ऋषभदेव महाराज बनारस वालों के, जो उन्होंने सुदामा नगर सेक्टर ए स्थित रामजी सदन, दत्त मंदिर के पास चल रहे संगीतमय भागवत ज्ञान यज्ञ के दौरान उपस्थित भक्तों को राम एवं कृष्ण जन्मोत्सव प्रसंगों की व्याख्या के दौरान व्यक्त किए। कथा में आज पहले राम जन्म और बाद में कृष्ण जन्मोत्सव धूमधाम से मनाए गए। कृष्ण जन्मोत्सव के लिए कथा स्थल को गुब्बारों, फूलों, पत्तियों और विद्युत श्रद्धा से श्रृंगारित किया गया था। जैसे ही कथा व्यास पं. ऋषभदेव ने कृष्ण जन्म की उद्घोषणा की, समूचा पांडाल भगवान के जयघोष से गूंज उठा। “आलकी की पालकी जय कन्हैया लाल की” और ‘नंद में आनंद भयो जय कन्हैया लाल की‘ जैसे भजनों पर कथा पांडाल थिरक उठा। कथा शुभारंभ के पूर्व अजय पांडे, ध्रुवेश दीक्षित, रणजीत राजपूत, विजय शर्मा, रेखा पुरे, श्रीमती मंजुला प्रशांत पांडे, श्रीमती प्रभा पांडे, श्रीमती सोना संजय, प्रिंस पांडे आदि ने व्यास पीठ का पूजन किया। बुधवार को कथा में गोवर्धन पूजा एवं बाल लीला प्रसंग होंगे। गुरुवार को रुक्मणी विवाह और शुक्रवार को सुदामा चरित्र एवं परीक्षित मोक्ष के साथ कथा का समापन होगा।
आचार्य पं. ऋषभदेव ने कहा कि भगवान कृष्ण ने समाज की राक्षसी प्रवृत्तियों के नाश के लिए ही अवतार लिया है। भगवान राम भी ऐसे अवतार हैं जिनके संपूर्ण जीवन क्रम में कहीं भी मर्यादा का उल्लंघन नहीं हुआ है। भारतीय समाज मर्यादाओं से बंधा हुआ है। दुनिया के सारे विवाद वहां पैदा होते है, जहां मर्यादा की लक्ष्मण रेखा पार कर ली जाती है। कृष्ण और राम के चरित्र आज हजारों वर्ष बाद भी वंदनीय और पूजनीय बने हुए हैं, क्योंकि समाज के गौरव और अस्मिता को बढ़ाने तथा दुष्टों का नाश कर भक्तों की रक्षा करने का संकल्प आज भी अनुभूत होता है।
