बर्फानी धाम के पीछे गणेश नगर में चल रहे अनुष्ठान में आज रावण वध एवं रामराज्याभिषेक के साथ होगा समापन

इंदौर।
दुनिया के सारे वैभव और ऐश्वर्य के संसाधन भगवान की कृपा के बिना भी मिल सकते हैं लेकिन भक्ति ऐसा अनमोल अलंकरण है जो बिना भगवत कृपा के नहीं मिल सकता। भक्ति के बिना दुनिया की बड़ी से बड़ी दौलत भी बेकार है। अधर्म और अनीति से अर्जित धन-संपत्ति फलीभूत नहीं होते। हम सब मोह की ऐसी चादर ओढ़े हुए हैं, जो हमें अपने लक्ष्य और सदकर्मों से विमुख बनाए हुए है। यह चादर जब तक नहीं हटेगी, विषय वासनाओं का कचरा भी नहीं हटेगा। कलियुग में व्यसनों का ज्यादा प्रभाव देखा जा रहा है। राम कथा मनुष्य को वासना और कामनाओं से मुक्त बनाकर उपासना मार्ग पर आगे बढ़ाती है भक्ति कोई सीजनल बिजनेस नहीं है, यह अखंड धारा हमारी सांस और धडकनों के साथ निरंतर प्रवाहमान रहना चाहिए।
बर्फानी धाम के पीछे स्थित गणेश नगर में माता केशरबाई रघुवंशी धर्मशाला परिसर के शिव-हनुमान मंदिर की साक्षी में चल रही रामकथा में गुरुवार को प्रख्यात मानस मर्मज्ञ पं. मनोज भार्गव ने प्रभु श्रीराम के वनवास काल और श्रीराम-सुग्रीव मित्रता प्रसंगों की व्याख्या के दौरान उक्त दिव्य विचार व्यक्त किए। प्रारंभ में आयोजन समिति की ओर से तुलसीराम-सविता रघुवंशी, संयोजक रेवतसिंह रघुवंशी एवं शताक्षी रघुवंशी के साथ पं. गोपालकृष्ण भार्गव, ओमप्रकाश शर्मा, उदयसिंह चौहान, वीरसिंह चौहान, प्रमोद पाटील, राहुल राठौर सहित अनेक विशिष्टजनों ने व्यास पीठ एवं रामचरितमानस का पूजन किया। विद्वान वक्ता की अगवानी आरके शुक्ला, मोहन सिंह रघुवंशी, गजेन्द्र सिंह चंदेल, सुरेन्द्र पटेल, केपी सिंह, महेश अग्रवाल, नारायण सिंह रघुवंशी, राजेंद्र सिंह रघुवंशी सहित अनेक भक्तों ने की। संयोजक रेवतसिंह रघुवंशी के अनुसार कथा का विश्राम शुकवार 9 जनवरी को दोपहर 1 से 5 बजे तक रावण वध एवं रामराज्याभिषेक प्रसंगों की संगीतमय कथा के बाद होगा। इस अवसर पर पं. भार्गव का आयोजन समिति की ओर से सम्मान भी किया जाएगा।
पं. भार्गव ने कहा कि बड़े-बड़े भंडारे या भव्य मंदिर बना देने से ही कोई बड़ा भक्त नहीं बन जाता। भक्त वही हो सकता है जो निष्पाप और निष्काम कर्म करता है। रामकथा के श्रवण से जीवन के लक्ष्य निर्धारण की दिशा मिलती है। भक्ति का पहला लक्षण चित्त की शांति, वात्सल्य भाव, दास भाव, निर्मल भाव जैसे गुण माने गए हैं। राम केवल कथा नहीं, धर्म भी है जिसमें हमारे प्रत्येक कर्म में परमार्थ के भाव को प्रमुखता दी गई है। रामकथा के श्रवण से मन निर्मल होता है।
