भगवान की लीलाओं के दर्शन एवं श्रवण से दूर होते हैं मन के विकार – पं. नागर

इंदौर हमारे धर्मग्रंथ सुषुप्त समाज को जागृत एवं चैतन्य बनाते हैं। मनुष्य का जीवन हमें केवल पशुओं की तरह व्यवहार करने के लिए नहीं, बल्कि सदभाव, परमार्थ और सेवा करूणा जैसे प्रकल्पों के लिए भी मिला है। भगवान अनुभूति का विषय है। हृदय में पवित्र संकल्प आयेंगें तो विचारों का प्रवाह भी निर्मल हो जाएगा। भगवान की लीलाओं के दर्शन एवं श्रवण से मन के विकार दूर होते हैं और शरीर की इंन्द्रियों पर सात्विक प्रभाव होता है। आत्मा और परमात्मा का मिलन है कृष्ण-रूक्मणी विवाह।
ये दिव्य विचार हैं मालवा के प्रख्यात भागवत मर्मज्ञ आचार्य पं. ब्रजकिशोर नागर के, जो उन्होंने शुक्रवार को धार रोड स्थित धरावरा धाम आश्रम पर महंत शुकदेव दास महाराज के सानिध्य में चल रहे मानस सम्मेलन एवं भागवत ज्ञान यज्ञ में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। कथा में कृष्ण-रुक्मणी विवाह का उत्सव धूमधाम से मनाया गया। इस दौरान मनोहारी भजनों पर समूचा पंडाल थिरक उठा। व्यास पीठ का पूजन नानूराम चौधरी के साथ ललित अग्रवाल, राजेंद्र गर्ग समर्पण, रेखा श्रीकांत शर्मा, डॉ. सुरेश चोपड़ा, देवेन्द्र सांखला, गोविन्द मंगल, सीताराम नरेडी, गोपाल गोयल, अशोक कुमावत आदि ने किया। कथा में शनिवार को दोपहर 1 से 5 बजे के बीच कृष्ण-सुदामा मैत्री प्रसंग के पश्चात समापन समारोह होगा। इस अवसर पर कथा व्यास पं. नागर का सम्मान किया जाएगा।
पं. नागर ने कहा कि भगवान को धन सम्पत्ति नहीं, मन के श्रेष्ठ भाव चाहिए। वे छप्पन भोग के नहीं, हमारे प्रेम की भावना के भूखे हैं। रूक्मणी मगंल प्रसंग हमारी भारतीय संस्कृति और मर्यादा का गौरवशाली उजला पक्ष है। रूक्मणी विवाह आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है। कृष्ण योगेश्वर, लीलाधर और नटवर की यही विशेषता है कि वे कृपा वर्षा करते भी हैं तो पता ही नहीं चलते देते। हमारी सभी देवी-देवता प्राणियों के उद्धार के लिए ही अवतरित होते हैं।
