
पंजाबी खत्री सभा की मेजबानी में श्रीनगर मेन स्थित गार्डन पर चल रही शिवपुराण कथा में आज होगा शिव-पार्वती विवाह
इंदौर संसार में हमारे कर्म सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण से घिरे होते हैं। शिव पुराण हमें अपने कर्मों को सही दिशा की ओर प्रवृत्त करने वाली कथा है। यह हमारे विवेक की जागृति का मार्ग प्रशस्त करती है। प्रशंसा से अभिमान और अभिमान से पतन निश्चित होता है, लेकिन मन और बुद्धि के समन्वय से ही हम तमोगुण से बच सकते हैं। बुद्धि तभी निर्मल और पवित्र होगी, जब हम सदगुणों को आत्मसात करेंगे। शिव पुराण पाप से निवृत्त होने की कथा है। सत्संग और भगवान की कथा जीवन को अपने लक्ष्य की ओर ले जाने का प्रकाश पुंज है। जीवन को पवित्र और सार्थक बनाने के लिए भगवान के नाम का आश्रय ही सर्वोत्तम माना गया है।
प्रख्यात आचार्य पं. विष्णुदत्त शर्मा महर्षि ने मंगलवार को श्रीनगर मेन स्थित गार्डन पर पंजाबी खत्री महिला मंच एवं खत्री सभा इंदौर की मेजबानी में चल रही महाशिवपुराण कथा के दूसरे दिन उपस्थित बंधुओं को विभिन्न प्रसंगों की व्याख्या के दौरान उक्त दिव्य विचार व्यक्त किए। प्रारंभ में खत्री सभा के अध्यक्ष प्रदीप बिरदी, महिला मंच की प्रमुख श्रीमती रीता टंडन, शशि बैजल, उर्वशी बिरदी, ममता सेठ, साधना कपूर आदि ने वैदिक मंगलाचरण के बीच व्यास पीठ की पूजा-अर्चना की। इस अवसर पर सैकड़ो श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री के सानिध्य में विद्येश्वर संहिता का सामूहिक पाठ भी किया। सभा के अध्यक्ष प्रदीप बिरदी ने बताया कि आचार्य पं. विष्णुदत्त शर्मा महर्षि यहां प्रतिदिन दोपहर 3 से शाम 6 बजे तक शिव महापुराण कथा की संगीतमय कथामृत की वर्षा कर रहे हैं। बड़ी संख्या में श्रीनगर सहित आसपास की कॉलोनियों के श्र्द्धालु कथा श्रवण का पुण्य लाभ उठा रहे हैं। मंगलवार को कथा में मनोहारी भजनों पर महिलाओं ने नाचते गाते हुए अपनी खुशियाँ व्यक्त की। कथा में बुधवार को कथा प्रसंगानुसार शिव-पार्वती विवाह का जीवंत उत्सव भी मनाया जाएगा। भगवान शिव की बारात भी निकलेगी और विवाह की अन्य परम्पराएं भी निभाई जाएंगी। महिला मंच की प्रमुख श्रीमती रीता टंडन ने बताया कि कथा के दौरान शिव पार्वती विवाह, कार्तिकेय जन्म प्रसंग, तुलसी जालंधर कथा, शिवरात्रि व्रत कथा, जप का महत्व एवं भगवान शिवाशिव की आराधना से जुड़े विभिन्न प्रसंगों की व्याख्या होगी।
आचार्य पं. शर्मा महर्षि ने कहा कि जीवन में थोड़ी सी सफलता मिलने पर ही अहंकार हमें घेर लेता है। चिंतन करें कि भगवान भी कर्ता है और इस सृष्टि का पालन-पोषण और जिम्मेदारियों का निर्धारण भी वे स्वयं करते हैं, लेकिन उन्हें कभी अहंकार नहीं होता। इसके उलट हम छोटी सी उपलब्धि का श्रेय और सेहरा अपने माथे पर बांधने में देर नहीं करते। यह अहंकार ही हमारे पतन का मुख्य कारण बन जाता है। मोह हमारे विकारों को जन्म देता है। कर्तापन का अहंकार हमेशा हमारे आसपास रहता है। शिवजी की भक्ति सबसे सहज और सरल मानी गई है। शिव नाम ही कल्याण का सूचक है।
