दलाल बाग पर सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में चल रही चातुर्मासिक धर्मसभा में आशीर्वचन

इंदौर, दूसरों में दोष देखना बहुत आसान है लेकिन स्वयं के दोष देखना बहुत बड़ी कला है। हम जितनी मेहनत दूसरों की कमियां खोजने में करते हैं, उतनी यदि स्वयं का निरीक्षण करने में करें तो हमारे जीवन में भी वास्तविक बदलाव आ सकता है। आलोचना से हमें सीखना चाहिए कि ऐसा व्यक्ति कई बार ऐसी कमियां भी दिखा देता है जिन्हें प्रशंसा करने वाले लोग नहीं देख पाते, इसलिए आलोचना को केवल अपमान मानकर अस्वीकार करने के बजाय उसमें छिपे सत्य को समझने का प्रयास करना चाहिए। जिस तरह सफ़ेद कपडे पर लगा छोटा सा काला धब्बा या दाग अलग ही दिखाई देता है उसी तरह अच्छे व्यक्ति की छोटी सी गलती भी लोगों की दृष्टि में आ जाती है। जो व्यक्ति स्वयं को अच्छा मानता है उसे दूसरों के दोष खोजने की जगह अपने भीतर झांकना चाहिए।
ये दिव्य और प्रेरक विचार हैं संत शिरोमणि प.पू. विद्यासागर म.सा. के परम प्रभावक शिष्य और राष्ट्रसंत मुनि पुंगव प.पू. श्री सुधासागर महाराज के, जो उन्होंने बुधवार को सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में वीआईपी रोड स्थित किला मैदान, दलाल बाग परिसर में निर्मित विद्या-सुधा मंडप में चल रहे चातुर्मास महोत्सव में आयोजित नियमित धर्मसभा में संबोधित करते हुए व्यक्त किए। धर्मसभा का शुभारंभ मंगलाचरण एवं पाद प्रक्षालन के साथ हुआ। इस अवसर पर चातुर्मास महोत्सव के चक्रवती अध्यक्ष नवीन गोधा, सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद गोधा, चक्रवर्ती मनीष गोधा, महोत्सव अध्यक्ष अशोक डोसी, महामंत्री हर्ष जैन, आकाश कोयला, प्रिंसपाल टोंग्या, गिरीश गिन्नी, संजय पाटोदी, सौरभ बडजात्या, राहुल सेठी एवं भूपेंद्र भोपाली सहित अनेक सहयोगी बंधुओं ने देशभर से आए साधकों की अगवानी की।
राष्ट्रसंत ने अपने आशीर्वचन में कहा कि सफलता की कुंजी केवल प्रशंसा नहीं बल्कि आलोचना से सीखने की क्षमता भी है। मंजिल तक पहुँचने वाला व्यक्ति वही है जो रास्ते में आने वाले काँटों से घबराकर रुकता नहीं बल्कि आगे बढ़ता जाता है। दान का उद्देश्य केवल धन देना नहीं बल्कि दूसरों को भी सेवा और सहयोग के लिए प्रेरित करना है। समाज में अच्छे कार्य सामने आते हैं तो दुसरे लोग भी उनसे प्रेरणा ले सकते हैं। धर्म और सत्कार्यों की प्रतिष्ठा आलोचना के भी से कम नहीं होना चाहिए। अच्छे कार्यों को खुली किताब की तरह रखना चाहिए ताकि उनकी समीक्षा हो सके और यदि कोई कमी सामने आए तो उसे सुधारा जा सके। जीवन में कई बार विपरीत हालात भी महत्वपूर्ण बन जाते हैं जैसे काले बादलों के बीच से निकलने वाला सूर्य अधिक चमकदार दिखाई देता है वैसे ही विपरीत हालातों में सत्य, सदाचार और अच्छे गुणों की पहचान अधिक स्पष्टता से होती है। राष्ट्रसंत ने राम और रावण के उदाहरण से धर्म और अधर्म के अंतर को भी समझाया। यदि हम स्वयं बुराइयों से घिरे हुए हैं तो हमें अच्छे लोगों की संगत करना होगी। स्वयं के दोष देखना ही वास्तविक साधना होती है।
