हिंगोट युद्ध: परंपरा, पराक्रम और संस्कृति का अद्भुत संगम
इंदौर के ऐतिहासिक नगर गौतमपुरा में दीपावली के दूसरे दिन इस वर्ष भी परंपरा, पराक्रम और रोमांच का अनोखा संगम देखने को मिला हिंगोट युद्ध के रूप में। यह युद्ध मात्र एक आयोजन नहीं, बल्कि सैकड़ों वर्षों से चली आ रही वीरता और सांस्कृतिक अस्मिता का जीवंत प्रतीक है, जो आज भी मध्यप्रदेश की लोकसंस्कृति की आत्मा को संजोए हुए है।
तुर्रा दल बनाम कलंगी दल साहस का मंज़र
हर वर्ष की तरह इस बार भी रुणजी का तुर्रा दल और गौतमपुरा का कलंगी दल आमने-सामने आए। आकाश में जलते हिंगोट (आग के गोले) दागते हुए जब योद्धा मैदान में उतरे, तो वातावरण “जयकारों” और “वीरता के स्वर” से गूंज उठा।
इस वर्ष एक दल के योद्धाओं की संख्या अधिक थी, पर दूसरे दल में योद्धाओं कम संख्या ने भी उनके जोश और जज्बे को तनिक कम नहीं किया। दोनों दलों ने बिना भय के परंपरा निभाते हुए अपनी-अपनी विरासत तथा प्रतिष्ठा की रक्षा में पूरा दमखम लगाया।
प्रशासन की सतर्कता और सुरक्षा व्यवस्था
हिंगोट युद्ध की प्रसिद्धि को देखते हुए इस वर्ष प्रशासन ने विशेष इंतज़ाम किए। गौतमपुरा थाना प्रभारी अरुण सोलंकी के अनुसार
“आयोजन के दौरान सुरक्षा के मद्देनज़र 200 पुलिस जवानों के साथ 100 कोटवार, नगर सैनिक और सुरक्षा समिति के सदस्य तैनात किए गए थे।”
इसके अलावा, एसडीएम राकेश सिंह त्रिपाठी और एसडीओपी संघ प्रिय सम्राट सहित बेटमा, गौतमपुरा, देपालपुर, हातोद, महू और चंद्रावतीगंज के पुलिस अधिकारी एवं कर्मचारी पूरे आयोजन के दौरान मौजूद रहे। सतर्क प्रशासनिक व्यवस्था के चलते इस वर्ष किसी भी अप्रिय घटना की सूचना नहीं मिली।
घायलों की त्वरित चिकित्सा व्यवस्था
हर साल की तरह इस बार भी कुछ लोग हिंगोट की चपेट में आए, लेकिन प्रशासन की तत्परता से स्थिति नियंत्रण में रही। कुछ लोग हल्के रूप से घायल हुए, जिनका मौके पर ही उपचार किया गया। और एक को जिला अस्पताल रैफर करना पड़ा
एसडीएम त्रिपाठी ने बताया कि
“ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर के नेतृत्व में कई एंबुलेंस और चिकित्सा दल पूरे समय मुस्तैद रहा। घायलों को तत्काल चिकित्सा सुविधा दी गई।”
परंपरा में बसा साहस और संस्कृति का भाव
गौतमपुरा का हिंगोट युद्ध केवल एक खेल नहीं, बल्कि वह लोकगाथा है जो वीरता, निष्ठा और परंपरा को जीवित रखती है। दीपावली के दूसरे दिन होने वाला यह आयोजन स्थानीय समुदाय की सांस्कृतिक आस्था और सामूहिक एकता का परिचायक है।
यह युद्ध लोगों को याद दिलाता है कि आधुनिकता की दौड़ में भी परंपराएं जीवित रह सकती हैं, यदि उन्हें समर्पण और अनुशासन से निभाया जाए।
इस अनोखे आयोजन को देखने के लिए गौतमपुरा और आसपास के जिलों तथा गांवों से हजारों की भीड़ उमड़ी। रोमांच, उल्लास और परंपरा की इस संगम में हर व्यक्ति अपने आप को गौरवान्वित महसूस कर रहा था। जयकारों से गूंजते मैदान में हर वार पर रोमांच का संचार हो रहा था।
हिंगोट युद्ध जीवंत सांस्कृतिक धरोहर और विरासत
आज जब पारंपरिक आयोजन धीरे-धीरे लुप्त हो रहे हैं, वहीं गौतमपुरा का हिंगोट युद्ध अपने 400 से अधिक वर्षो के अस्तित्व को पूरी गरिमा और श्रद्धा के साथ संजोए हुए है। यह आयोजन न केवल मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर है, बल्कि देशभर के लोगों के लिए एक प्रेरणा है कि संस्कृति तब तक जीवित रहती है जब तक उसे निभाने वाले लोग जज़्बे से भरे हों।
“हिंगोट युद्ध केवल आग का खेल नहीं, यह हमारी परंपरा का वो दीप है जो हर दीपावली पर वीरता, एकता और संस्कृति की लौ को फिर से प्रज्वलित करता है।”
