दलाल बाग स्थित नवरत्न नगरी में आचार्य प.पू. विश्वरत्न सागर म.सा. की निश्रा में मुमुक्षु कुणाल बन गए पुण्यरत्न सागर और मुनिराज उदयरत्न बने गणिवर्य

इंदौर, । वीआईपी रोड दलाल बाग स्थित नवरत्न नगरी पर रविवार को 24 घंटे की अवधि में दो दीक्षा समारोह और एक मुनिराज का गणि पद प्रदान महोत्सव जैसे अनूठे कीर्तिमान बन गए। जैनाचार्य प.पू. विश्वरत्न सागर म.सा. एवं आचार्य मृदुरत्न सागर म.सा. करीब 70 साधु-साध्वी-भगवंतों की पवन निश्रा एवं उपधान तप के 70 तपस्वियों की विशिष्ठ मौजूदगी में श्वेताम्बर जैन समाज इंदौर के इतिहास में पहली बार ये नए कीर्तिमान स्थापित हुए। शनिवार को 59 वर्षीय सुरेश कोठारी की दीक्षा संपन्न हुए 24 घंटे भी नहीं हुए कि रविवार को फिर एक और युवा २१ वर्षीय कुणाल कमठोरा ने भी संसार के वैभव और गाड़ी-बंगले को छोड़कर संयम, त्याग और वैराग्य की राह पकड़ ली। दलाल बाग पर आज सुबह से दोपहर तक चली करीब 5 घंटे की शास्त्रोक्त विधि के बाद मुमुक्षु कुणाल को आचार्यश्री ने पुण्यरत्न सागर और मुनिराज उदयरत्न सागर के नाम के आगे गणिवर्य की उपाधि प्रदान करते हुए उन्हें जिन शासन की परंपरा के अनुसार नूतन वस्त्र भेंटकर पाट पर विराजित किया।
अर्बुद गिरिराज जैन श्वेताम्बर तपागच्छ उपाश्रय ट्रस्ट, पीपली बाजार, समग्र जैन श्वेतांबर श्री संघ मालवा महासंघ एवं नवरत्न परिवार के तत्वावधान में सुबह 9 बजे से प्रारंभ हुई शास्त्रोक्त विधियों को देखने के लिए देशभर से आए हजारों समाजबंधु मौजूद थे। मुमुक्षु कुणाल की आयु मात्र २१ वर्ष है और पिछले 2 वर्षों से वे अनेक तीर्थों सहित करीब एक हजार किलोमीटर विहार और गुरुकुलवास कर चुके हैं। वर्धमान ताप की 15 ओली भी उनके खाते में हैं। वे मूलतः भानपुरा के हैं और अब तक साध्वीवर्या प.पू. सौम्य यशा श्रीजी म.सा. की निश्रा में संयम की राह पर अग्रसर हुए हैं। रविवार को सुबह जब संसारी वेशभूषा में सोने के गहनों से लदे हुए वे आचार्य श्री विश्वरत्न सागर म.सा. से आशीर्वाद लेने पहुंचे तो उन्हें सन्यास का प्रतीक ओघा सौंपा गया, जिसे पाकर वे ख़ुशी से मच पर ही इतने झूम उठे कि उनके परिजनों एवं अन्य साधु-भगवंतों ने उन्हें रोका। गुजरात के वाराही से लाई गई भगवान शांतिनाथ की प्रतिमा की साक्षी में उन्होंने वैराग्य के मार्ग पर चलने की विभिन्न प्रक्रियाएं ख़ुशी-ख़ुशी निभाई और अपना वेश बदलने के लिए दूसरे कक्ष में चले गए। करीब 1 घंटे बाद जब वे ढोल-धमाको के साथ लौटे तो स्वयं आचार्य विश्वरत्न सागर उन्हें लेने के लिए पहुंचे और कंधे पर हाथ रखकर उन्हें मंच तक लाए। मंच पर उनका केश लोच की प्रतीकात्मक विधि संपन्न कर उनके परिजनों को उनके केश सौंपे गए। इस मौके पर महोत्सव के लाभार्थी एवं अन्य बोली लगाने वाले समाजबंधुओं का बहुमान भी किया गया।
इस दौरान हजारों समाजबंधुओं ने अक्षत वर्षा कर उन्हें वैराग्य के मार्ग पर आगे बढ़ने के शुभाशीष प्रदान किए। महोत्सव के मुख्य लाभार्थी दिलीप-ललित सी. जैन एवं प्रीतेश-अनिता ओस्तवाल ने मंच पर आने के बाद उन्हें साधु जीवन में काम आने वाली कामली, आसन, डांडी एवं अन्य वस्तुएं भेंट की। भगवान शांतिनाथ की साक्षी में आचार्यश्री ने उन्हें मुनिराज पुण्यरत्न सागर का नया नाम दिया और इस तरह करीब 5 घंटे की अवधि में कुणाल कमठोरा जिन शासन के मुनिराज बन गए। इस अवसर पर आयोजन समिति की ओर से पुण्यपाल सुराना, कैलाश नाहर, ललित सी. जैन, मनीष सुराना, दिलसुखराज कटारिया, प्रीतेश ओस्तवाल, अंकित मारु, दिलीप मंडोवरा एवं दीपक सुराना आदि ने सभी समाजबंधुओं एवं संतों की अगवानी की। कार्यक्रम में वरिष्ठ समाजसेवी डॉ. प्रकाश बांगानी, यशवंत जैन, नागेश्वर तीर्थ ट्रस्ट के सचिव धर्मचंद्र जैन, मुंबई के मलाड, कांदिवली और जयपुर, अजमेर, सूरत, अहमदाबाद सहित देश के अनेक शहरों के समाजबन्धु मौजूद रहे। इस दौरान नवरत्न नगरी बार-बार जिन शासन, महावीर स्वामी, दीक्षार्थी और जैनाचार्यों के जयघोष से गुंजायमान बना रहा।
इसके पूर्व मुनिराज उदयरत्न सागर म.सा. को गणि पद प्रदान महोत्सव का शुभारंभ भी मुमुक्षु कुणाल के साथ प्रारंभ हुआ। मुनिराज को गणिवर्य कीर्ति रत्न सागर म.सा. ने नंदीसूत्र के 750 मंत्र सुनाए और उन्हें भी शांतिनाथ भगवान की प्रतिमा के समक्ष संकल्प दिलाए। गणिवर्य पद के लिए काम आने वाली वस्तुएं भेंट करने के पहले उनकी बोली भी लगाई गई। इनमें स्वर्ण माला, पाट, आसन सहित नूतन वस्त्र शामिल थे। आचार्यश्री एवं साधु-भगवंतों ने उन्हें पाट पर विराजित कर चन्दन तिलक लगाया और लाभार्थी परिवारों ने नूतन वस्त्र भेंट किए। दोपहर 12.40 बजे ऐसा संयोग बना कि इधर मंच पर मुनिराज से गणिवर्य बने उदयरत्न सागर विराजित हुए और उधर नूतन साधु वेश धारण कर मुमुक्षु कुणाल ढोल-धमाकों सहित मंच पर आने के लिए तत्पर रहे। आचार्यश्री ने उन्हें उनके नाम में परिवर्तन किए बिना उन्हें गणिवर्य का पद प्रदान करने की क्रिया संपन्न की और कान में मन्त्र भी फूंके। उदयरत्न सागर के संसारी जीवन के बड़े भाई उत्तमरत्न सागर म.सा. और अन्य परिजन भी पहले से ही जिन शासन की सेवा में सन्यास जीवन की राह पर चल रहे हैं।
