सुदामा नगर में चल रहे सात दिवसीय भागवत ज्ञानयज्ञ का समापन, हुआ कृष्ण-सुदामा मिलन – पं. ऋषभदेव का सम्मान

इंदौर, । ऊंचे पदों पर बैठे लोगों को अपने बाल सखाओं के दुख-दर्द में भागीदार बनने का संदेश भी इस प्रसंग से मिलता है। यह भारत भूमि का ही पुण्य प्रताप है कि यहां कृष्ण जैसे राजा और सुदामा जैसे स्वाभिमानी ब्राह्मण हुए। राजमहलों के दरवाजे झोपड़ी में रहने वालों के लिए जिस दिन खुल जाएंगे, उस दिन देश का प्रजातंत्र सार्थक हो उठेगा। कलयुग में मित्रता को नए सिरे से परिभाषित करने की जरूरत है। कृष्ण और सुदामा की मित्रता का दुनिया में कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता।
ये दिव्य विचार हैं बालव्यास भागवताचार्य पं. ऋषभदेव महाराज बनारस वालों के, जो उन्होंने सुदामा नगर सेक्टर ए स्थित रामजी सदन, दत्त मंदिर के पास चल रहे संगीतमय भागवत ज्ञान यज्ञ के दौरान उपस्थित भक्तों को कृष्ण-सुदामा मिलन एवं परीक्षित मोक्ष प्रसंगों की व्याख्या के दौरान व्यक्त किए। कृष्ण-सुदामा मिलन का जीवंत और भावपूर्ण उत्सव देखकर अनेक आँखे सजल हो उठी। कथा शुभारंभ के पूर्व व्यास पीठ का पूजन श्रीमती सोना संजय पांडे, विकास मिश्रा, अजय पांडे, मनोहर तिवारी, कमल देराश्री, प्रदीप पांडे, घनश्याम मिश्रा, दिनेश वाजपेयी, ललित कुमार, कुसुमलता विद्यार्थी, वैशाली तरुण गावड़े आदि ने किया। विद्वान वक्ता की अगवानी श्रीमती मंजुला प्रशांत पांडे, श्रीमती प्रभा पांडे, मधुसुदन दुबे, अखिलेश राजावत, शिवानी रॉबिन सारडा, प्रिंस पांडे, ध्रुवेश दीक्षित, रणजीत राजपूत, विजय शर्मा आदि ने की। आयोजन समिति की ओर से भागवताचार्य पं. ऋषभदेव का शाल-श्रीफल भेंट कर सम्मान भी किया गया।
आचार्य पं. ऋषभदेव ने कहा कि कृष्ण और सुदामा का मिलन राजमहल और झोपड़ी के मिलन जैसा है। जिस दिन आज के राजा अपने महलों के दरवाजे सुदामा जैसे आम आदमी के लिए खोल देंगे, उस दिन देश में फिर कृष्णयुग लौट सकता है। कृष्ण और सुदामा की मित्रता पूरी दुनिया में अनूठा उदाहरण है। मित्रता के नाम पर स्वार्थ और मोह-माया से बंधे रिश्ते ज्यादा दिनों तक नहीं चलते। कृष्ण-सुदामा जैसा मैत्री भाव पूरे विश्व की जरूरत है। भागवत ऐसा कालजयी ग्रन्थ है जिसके श्रवण और मनन-मंथन से परीक्षित की तरह हम सबको भी मोक्ष मिल सकता है। मौत का भय दूर होना ही मोक्ष है।
