अन्नपूर्णा मंदिर के विशाल परिसर में चल रही भागवत कथा में दिनोंदिन उमड़ रहा भक्तों का सैलाब, भजनों पर नाच रहा समूचा पंडाल

इंदौर, । हमारी तकदीर कोई ठेकेदार, इंजिनियर या आर्किटेक्ट से लगाकर हमारे माता-पिता और गुरु भी नहीं बना सकते। तकदीर बनती है हमारे श्रेष्ठ कर्मों से। हमारे जैसे कर्म होंगे फल भी वैसे ही मिलेंगे और तकदीर भी उन्हीं से बनेगी। विश्वास रखें कि यदि हमारी करनी अच्छी होगी तो हमारे भाग्य का निर्माण भी अच्छा ही होगा। हमारे मन, कर्म और वचन और व्यवहार से किसी को भी चोंट नहीं पहुंचना चाहिए। याद रखें कि कर्म शुद्ध होंगे तो विचार भी शुद्ध होंगे, विचार शुद्ध होंगे तो भाग्य भी शुद्ध होगा, भाग्य शुद्ध होगा तो भक्ति भी शुद्ध होगी और भक्ति शुद्ध होगी तो हम सबका जीवन भी परमशुद्ध बन जाएगा। जीवन की यात्रा को बहुत समझदारी के साथ तय करना चाहिए। हमारी सांगत ऐसे लोगों के साथ होना चाहिए जो हमें भटकाव से हटाकर सही मार्ग की ओर ले जाते हैं।
ये दिव्य और प्रेरक विचार हैं मालव माटी के सपूत, माँ सरस्वती के वरद पुत्र और प्रदेश में 200 से अधिक गौशालाओं के संचालक संत कमलकिशोर नागर के सुपुत्र तथा प्रख्यात भागवत मर्मज्ञ संत प्रभुजी नागर के, जो उन्होंने शुक्रवार को अन्नपूर्णा मंदिर परिसर में चल रहे सात दिवसीय भागवत ज्ञान यज्ञ के दौरान उपस्थित जन सैलाब को विभिन्न प्रसंगों की व्याख्या के दौरान व्यक्त किए। कथा श्रवण के लिए बड़ी संख्या में मालवा के अलावा राजस्थान और अन्य जिलों से भी श्रद्धालु बोरिया-बिस्तर और राशन-पानी लेकर ट्रेक्टर-ट्राली, बोलेरो और अन्य निजी वाहनों से आए हुए हैं जो कथा पंडाल में ही रात्री विश्राम के साधन सहित कथा श्रवण कर रहे हैं। अन्नपूर्णा आश्रम के महामंडलेश्वर स्वामी विश्वेश्वरानंद गिरि, ओम्कारेश्वर के अन्नपूर्णा मंदिर के महामंडलेश्वर स्वामी सच्चिदानंद गिरि एवं स्वामी जयेंद्रानंद गिरि सहित अनेक साधु संत भी कथा श्रवण कर रहे हैं। प्रारंभ में कथा के मुख्य यजमान सुरेश अग्रवाल, समाजसेवी रामबाबू अग्रवाल, दिनेश बंसल पंप, श्यामबाबू, रमेश अग्रवाल, सुखदेव पाटीदार, ओमप्रकाश बंसल, हेमंत गर्ग सहित बड़ी संख्या में विभिन्न धार्मिक सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि और पदाधिकारियों ने उनकी अगवानी की। मंच का संचालन राजेश अग्रवाल ने किया। अन्नपूर्णा के इस परिसर में पं. प्रभुजी अपने श्रीमुख से 12 नवंबर तक प्रतिदिन दोपहर 12 से 3 बजे तक भागवत कथामृत की वर्षा करेंगे।
पं. नागर ने आज भक्तों को तस्वीर, तासीर और तकदीर को जोड़कर प्रेरक आशीर्वचन दिए। उन्होंने कहा कि माता-पिता ने हमें जो शरीर दिया है, वही हमारी तस्वीर है। जिस तरह हम अपने घर के ड्राइंग रूम में अच्छी तस्वीरों को सजाकर बढ़िया फ्रेम में लगाते हैं, उसी तरह इस शरीर रूपी तस्वीर को भी एक अच्छी फ्रेम और उस फ्रेम को एक अच्छी दीवार भी चाहिए। यह फ्रेम कौन लाएगा और कौन उस तस्वीर को कील से ठोंकेगा, यह हमारी तासीर पर निर्भर करता है। लोग पूछते हैं कि इतना दान,धर्म, कथा, भागवत, पूजा-पाठ होने के बाद भी लोग क्यों नहीं सुधरते, तो ऐसे लोगों को यह याद रखना चाहिए कि उनकी तासीर ही ऐसी है कि जैसे अनेक लोगों को दूध, बादाम या और मेवा-मिष्ठान नहीं लगते या उन्हें इन पौष्टिक चीजों का उपयोग करने के बाद भी कोई फर्क नहीं पड़ता, वैसे ही कुछ लोगों की तासीर इसी तरह की है कि उन पर उनके प्रारब्ध के कारण इस सभी बातों का असर नहीं पड़ता। यदि हमारी तस्वीर की तासीर ठीक-ठीक बन गई तो हमें भी द्वारका, अयोध्या जैसी दीवार मिल सकती है। सुंदर तस्वीर को हर कहीं नहीं रखा जाता। परमहंस लोगों के आने-जाने की जगह अर्थात अपने ड्राइंग रूम में रखते हैं। हमारा स्वाभाव अच्छा होगा तो सब हमें साथ लेकर चलेंगे, हमसे बात करेंगे हमको मान-सम्मान देंगे। गौशाला में मारकनी गाय को कोई रोटी देने नहीं जाता जबकि सीधी-सधी गाय को हर कोई प्रेम से हाथ फेरकर रोटी खिलाता है। जिन लोगों पर दूध-मक्खन और हमारे सद विचारों का असर नहीं होता, उनकी तासीर ही ऐसी होती है कि कोई भी उन्हें नहीं सुधार सकता।
पं. नागर ने आज भी अनेक मनोहारी भजनों पर समूचे पंडाल को कई बार थिरकाया। जैसे ही उनके भजन शुरू होते हैं, पंडाल में बैठे पचासों महिला, पुरुष और बच्चे उठकर नाचने-झूमने लगते हैं। आज भी उन्होंने सनातन धर्म के सर्वश्रेठ ग्रन्थ भागवत के श्रीचरणों में और उपस्थित सभी संतों को नमन करते हुए कहा कि भक्ति की स्थिति नमक जैसी है। गोस्वामी तुलसीदास ने भी भक्ति को नमक कहा है। नमक ही एकमात्र ऐसा तत्व है जिसे हम भोजन पकने के बाद भी डाल सकते हैं। आशय यह है कि व्यक्ति को माँ के गर्भ से लेकर किशोर और युवावस्था तक तो भक्ति करना ही चाहिए, अंतिम समय में भी नमक की तरह भक्ति को नहीं छोड़ना चाहिए। नमकरुपी भक्ति ही जीवन का स्वाद सुधारेगी। कथा में भी ऐसी ताकत है जो जीवन की दशा और दिशा सुधार सकती है। दुर्योधन की तासीर थी कि उसने भगवान से सहारा माँगा जबकि अर्जुन ने साथ माँगा। सहारा थोड़ी देर के लिए होता है, फ्रेक्चर होने पर लकड़ी और वाकर का सहारा लेते हैं और जब ठीक हो जाते हैं तो वह लकड़ी या वाकर हटा देते हैं। इसलिए भगवान से सहारा नहीं अर्जुन की तरह साथ मांगो।
पं. नागर की इस कथा का श्रवण करने के लिए दिनों-दिन भक्तों की संख्या बढती जा रही है। कथा आयोजक सुरेश अग्रवाल ने बताया कि अधिक संख्या में श्रद्धालु आएँगे तो पंडाल का और भी विस्तार करने की व्यवस्था की हुई है। भक्तों की सुविधा के लिए कथा स्थल पर बैठक व्यवस्था, मेगा स्क्रीन, साफ़सफाई, रोशनी, पेय जल, वाहनों के निःशुल्क पार्किंग, गोसेवा सहित समुचित प्रबंध किए गए हैं। झाबुआ जिले के 10 आदिवासी तीर-कमान सहित कथा स्थल की सुरक्षा और भक्तों के मार्गदर्शन के लिए स्वयं चलकर आए हैं। ये सभी आदिवासी भाई पं. कमल किशोर जी नगर की हरेक कथा में इसी तरह अपनी सेवाएँ देते हैं। इंदौर में भी सभी आदिवासी तीर-कमान सहित बुजुर्गों के लिए सहारा बनाकर सेवाएँ दे रहे हैं।
