अ.भा. अखंड वेदांत संत सम्मेलन में स्कूली बच्चों ने ली लव-जिहाद, धर्मांतरण और नशाखोरी से दूर रहने की शपथ

इंदौर । भारतीय संस्कृति की जड़ें बहुत गहरी हैं। असंख्य हमलों के बाद भी हमारी सनातन संस्कृति सुरक्षित है बल्कि इन हमलों ने हमारी संस्कृति को मजबूत बनाया है तो विश्वास रखें कि सनातन धर्म पर मंडरा रहे संकट के बादल ज्यादा दिनों तक नहीं रह पाएँगे। इसके लिए हमें विशेषकर युवाओं को संगठित होकर विधर्मियों के मनसूबों को ध्वस्त करना होगा। जब तक हमारी नई पौध संस्कारों से समृद्ध नहीं बनेगी, तब तक हमें सनातन धर्म और संस्कृति पर सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। इतिहास गवाह है कि हम शस्त्रों के साथ शास्त्रों को भी अपना हथियार बनाकर विजयी हुए हैं। वेदांत संत सम्मेलन समाज को नई चेतना और जागरूकता के मार्ग पर प्रशस्त करने वाला दिव्य अनुष्ठान है।
ये प्रेरक और ओजस्वी विचार हैं आर्ष विद्या प्रतिष्ठान के महामंडलेश्वर स्वामी प्रणवानंद सरस्वती के जो उन्होंने ने सोमवार को बिजासन रोड स्थित अविनाशी अखंड धाम आश्रम पर चल रहे 58वें अ.भा. अखंड वेदांत संत सम्मेलन की धर्मसभा में व्यक्त किए। संत सम्मेलन के पांचवे दिन सत्संग सत्र में मुंबई से आए महामंडलेश्वर स्वामी चिदम्बरानन्द सरस्वती, वृंदावन से आए महामंडलेश्वर स्वामी जगदीश्वरानंद, वृंदावन से ही आए स्वामी केशवानंद, नैमिषारण्य से आए स्वामी पुरुषोत्तमानंद, डाकोर से आए स्वामी देवकीनंदन दास, रतलाम से आए महामंडलेश्वर स्वामी देवस्वरूप, चौबारा जागीर के स्वामी नारायणानंद, साध्वी आदित्य चेतना गिरि, उज्जैन से आए स्वामी परमानंद, संत राजानंद सहित अनेक संतों ने वेद वेदांत, गीता, भागवत और रामायण सहित अनेक ज्वलंत विषयों पर अपने विचार रखे। प्रारंभ में आयोजन समिति की ओर से अध्यक्ष हरि अग्रवाल, अशोक गोयल, दीपक जैन टीनू, भावेश दवे, ठा. विजय सिंह परिहार, किशोर गोयल, हेमंत खंडेलवाल, राजेंद्र सोनी, विनय जैन, डॉ. हरिनारायण विजयवर्गीय, जवाहरलाल शर्मा, राजेंद्र गर्ग, मुरलीधर धामानी, डॉ. चेतन सेठिया, शिवम कछवाहा, राहुल शर्मा, वासुदेव चावला, सुश्री किरण ओझा आदि ने सभी संतों एवं मेहमानों का स्वागत किया। मंच का संचालन हरि अग्रवाल एवं स्वामी नारायणानंद ने किया।
विहिप मातृशक्ति और सनातनी महिला संगठन का आयोजन – संत सम्मेलन के दौरान आश्रम के महामंडलेश्वर डॉ. स्वामी चेतन स्वरुप की अध्यक्षता एवं पूर्व मंत्री सुश्री उषा ठाकुर एवं डॉ. प्रतीक श्रीवास्तव के आतिथ्य में विश्व हिंदू परिषद और सनातनी महिला संगठन के तत्वावधान में लव-जिहाद, धर्मान्तरण, नशे की प्रवत्ति एवं अन्य सामाजिक कुरीतियों के प्रति स्कूली बच्चों को जागरूक करने के उद्देश्य से विशेष आयोजन किया गया। इस अवसर पर अखंड धाम प्रबंध समिति के अध्यक्ष हरि अग्रवाल, संयोजक अशोक गोयल, संगठन सचिव भावेश दवे, महासचिव दीपक जैन टीनू, योग गुरु दिव्य दर्शन श्रीवास्तव एवं सीए सुनील लघाटे विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित थे। अतिथियों ने संतों के सानिध्य में दीप प्रज्वलन कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। विहिप मातृशक्ति इंदौर विभाग की सह संयोजक ज्योति श्रीवास्तव ने इस अवसर पर श्रीजी इंटरनेशनल स्कूल के बच्चों को लव-जिहाद, धर्मांतरण और नशाखोरी से दूर रहने के संकल्प दिलवाए। सनातन महिला संगठन की ओर से सुनीता दीक्षित, डॉ. अंजना गौरानी, रचना चिटनिस, रितु श्रीवास्तव, मंगला जैन, अलका जगदीश सैनी, गंगा बिजावा आदि ने सभी अतिथियों का स्वागत किया। विहिप मालवा प्रान्त विधि प्रकोष्ठ के संयोजक अनिल नायडू भी विशेष रूप से इस कार्यक्रम में शामिल हुए। सभी वक्ताओं ने लव-जिहाद को सनातन धर्म एवं संस्कृति पर कड़ा दंश बताते हुए बच्चों को आगाह किया कि वे इन सब कुरीतियों के प्रति सजग रहें। वक्ताओं ने लव-जिहाद की जमीनी हकीकत को खुले शब्दों में व्यक्त किया। राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। संचालन अंजना गौरानी ने किया।
किसने क्या कहा – आर्ष विद्या प्रतिष्ठान के महामंडलेश्वर स्वामी प्रणवानंद सरस्वती ने कहा कि हिंदू सनातन धर्म सत्य और अहिंसा की बुनियाद पर टिका है। आज के दौर में हमें विधर्मियों के मनसूबे को पहचानकर सनातन धर्म को नुकसान पहुँचाने के दुष्प्रयासों का संगठित होकर मुकाबला करने की जरूरत है। मुंबई से आए महामंडलेश्वर स्वामी चिदम्बरानन्द सरस्वती ने वेद और वेदांत की महत्ता बताते हुए देश की युवा पीढ़ी का आह्वान किया कि वे अपने आसपास नजर रखें और सनातन धर्म को नुकसान पहुँचाने के प्रयासों का प्रतिकार करें। वृंदावन से आए महामंडलेश्वर स्वामी जगदीश्वरानंद ने कहा कि संत हमेशा समाज के हित का चिंतन करते हैं। मोह माया में फंसे हुए संसारी लोग वेदांत और धर्म संस्कृति से विमुख होते जा रहे हैं। शास्त्र और संत हमें मोह से बचाते हैं। वृंदावन से ही आए स्वामी केशवानंद ने कहा कि साधु संतों के सानिध्य में रहकर हमें समाज को जागरूक बनाने की जरूरत है। संत सम्मेलन जैसे आयोजन अंधकार में प्रकाश की तरह हमारा मार्गदर्शन करते हैं। नैमिषारण्य से आए स्वामी पुरुषोत्तमानंद महाराज ने कहा कि जीव में पूर्ण आनंद तभी मिलेगा जब हम माया के बन्धनों से मुक्त होकर दिव्यानंद, सचिदानंद और नित्यानंद की अनुभूति करेंगे। विवेक के आभाव में ही मनुष्य पशुवत आचरण करता है, इससे बचने के लिए ही सत्संग का आश्रय लेना होगा। डाकोर से आए स्वामी देवकीनंदन दास ने कहा कि पुष्प एक ही होता है लेकिन उसका उपयोग कभी भगवान के चरणों में, कभी नारी के श्रृंगार में, कभी किसी शव पर और कभी उसी पौधे पर ही लगा रह जाता है। हमारी आराधना और साधना ऐसी होना चाहिए कि हमें मुक्ति मिल सके। जटायु और शबरी ने निष्काम भाव से शरणागति प्राप्त की और प्रभु के समीप पहुँच गए। संत सम्मेलन में रतलाम से आए महामंडलेश्वर स्वामी देवस्वरूप, चौबारा जागीर के स्वामी नारायणानंद, साध्वी आदित्य चेतना गिरि, उज्जैन से आए स्वामी परमानंद, संत राजानंद ने भी ओजस्वी विचार व्यक्त किए।
आज के कार्यक्रम-अखंड धाम पर चल रहे 58वें अ.भा. अखंड वेदांत संत सम्मेलन के छठे दिन 9 दिसंबर को दोपहर 3 बजे से मुंबई से आए महामंडलेश्वर स्वामी चिदम्बरानन्द सरस्वती, आर्ष विद्या प्रतिष्ठान के महामंडलेश्वर स्वामी प्रणवानंद सरस्वती, वृंदावन से आए महामंडलेश्वर स्वामी जगदीश्वरानंद, वृंदावन से ही आए स्वामी केशवानंद, नैमिषारण्य से आए स्वामी पुरुषोत्तमानंद, डाकोर से आए स्वामी देवकीनंदन दास, रतलाम से आए महामंडलेश्वर स्वामी देवस्वरूप, चौबारा जागीर के स्वामी नारायणानंद, साध्वी आदित्य चेतना गिरि, उज्जैन से आए स्वामी परमानंद, संत राजानंद एवं अन्य संत विद्वानों के प्रवचनों की अमृत वर्षा होगी।
