छत्रीबाग रामद्वारा आगमन पर भक्तों ने की अगवानी – आज और कल भी होगी प्रवचनों की अमृतवर्षा

इंदौर। हम सबके जीवन में राम नाम के बिना सन्मति नहीं मिल सकती। जीवनभर हम दौड़धूप कर चाहे जितनी संपत्ति एकत्र कर लें, सन्मति तो हमें राम नाम से ही प्राप्त होगी। जीवन का सार राम नाम में ही निहित है। धर्मग्रन्थों में भी जीवन को दिशा देने की अनेक अनमोल बातें मिलती हैं लेकिन राम के नाम बिना उन बातों की सार्थकता नहीं हो सकती। संत विद्वानों के सानिध्य में राम का नाम जीवंत और साकार हो उठता है। अन्तर्राष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय के आद्याचार्य स्वामी रामचरण महाराज ने अपने जीवनभर राम नाम की महिमा को जन-जन तक पहुँचाया। हमारी अनंत जन्मों की तपस्या का ही परिणाम है कि हमें इस कलियुग में भी संत महापुरुषों का सानिध्य मिल रहा है।
ये दिव्य और प्रेरक विचार हैं अंतर्राष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय के आचार्य स्वामी रामदयाल महाराज के, जो उन्होंने शुक्रवार को छत्रीबाग स्थित रामद्वारा में आयोजित सत्संग सभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को आशीर्वचन देते हुए व्यक्त किए। स्वामी रामदयाल महाराज के रामद्वारा आगमन पर रामद्वारा ट्रस्ट की ओर से लक्ष्मी कुमार मुछाल, रामसहाय विजयवर्गीय, रामनिवास मोड़, देवेन्द्र कुमार मुछाल, गिरधर गोपाल नेमा, हेमंत काकानी एवं वासुदेव सोलंकी ने उनकी अगवानी कर आरती उतारी। स्वामी रामदयाल महाराज छत्रीबाग रामद्वारा पर रविवार, 21 दिसम्बर तक विराजमान रहकर प्रतिदिन प्रातः 9 से 11 एवं अपराह्न 4 से शाम 6 बजे तक श्रद्धालुओं को पावन सानिध्य प्रदान करेंगे। वे रविवार को प्रातः 8.30 से 9.30 बजे तक अपने प्रवचनों की अमृतवर्षा के बाद गुजरात के डाकोरजी के लिए प्रस्थान करेंगे। उसके पूर्व शनिवार को भी सुबह 8 से 11 और शाम 4 से 6 बजे तक भक्तों से मिलकर उनकी धार्मिक-आध्यात्मिक जिज्ञासाओं का भी प्रश्नोत्तरी के माध्यम से समाधान करेंगे।
जगद्गुरु स्वामी रामदयाल महाराज ने अपने आशीर्वचन में कहा कि आद्याचार्य स्वामी रामचरण महाराज ने जीवन पर्यन्त राम नाम की साधना और तपस्या की। ब्रह्म के बारे में उनकी अनुभूति से लगता है कि जीवन का सार राम नाम में ही मौजूद है। उनके सानिध्य में राम का नाम जीवंत हो उठता है। ऐसा लगता है कि उनका जन्म नहीं, अवतरण हुआ है। छत्रीबाग रामद्वारा ऐसी तपोभूमि है जिसके कण-कण में राम नाम का पुण्य रचा बसा है। यहाँ आ जाने के बाद फिर कहीं और जाने का मन नहीं होता। संत और महापुरुषों की सन्निधि हमारे अनंत जन्मों की तपस्या के बाद ही मिल पाती है। हम सब सौभाग्यशाली हैं जिन्हें सहज ही इस कलिकाल में भी महापुरुषों का सानिध्य मिल रहा है।
