
भक्ति निष्काम और निर्दोष होना चाहिए : पं. शास्त्री
इन्दौर।
संसार की दृष्टि से भगवान की लीलाओं का चाहे जो अर्थ-अनर्थ निकाला जाए, यह शाश्वत सत्य है कि यदि हमारी भक्ति अडिग और अखंड रहेगी तो भगवान को रक्षा के लिए आना ही पड़ेगा। भगवान का अवतरण भक्तों की रक्षा और दुष्टों के नाश के लिए ही हुआ है। उनकी लीलाओं में प्राणीमात्र के प्रति सदभाव और कल्याण का चिंतन होता है। भक्ति निष्काम और निर्दोष होना चाहिए। भक्ति मनुष्य को निर्भयता प्रदान करती है।
ये प्रेरक विचार हैं भागवत भूषण आचार्य पं. राजेश शास्त्री के, जो उन्होंने लोहारपट्टी स्थित श्रीजी कल्याण धाम, खाड़ी के मंदिर पर हंसदास मठ के पीठाधीश्वर श्रीमहंत स्वामी रामचरणदास महाराज एवं महामंडलेश्वर महंत पवनदास महाराज के सानिध्य में चल रहे भागवत ज्ञानयज्ञ में वामन अवतार, राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव प्रसंगों की व्याख्या के दौरान व्यक्त किए। कथा में गोवर्धन पूजा का उत्सव महामंडलेश्वर स्वामी राधे राधे बाबा के सानिध्य एवं पूर्व विधायक आकाश विजयवर्गीय के आतिथ्य में धूमधाम से मनाया गया। नन्हे मुन्ने बाल ग्वालों ने भगवान के साथ गायों की सेवा का जीवंत उत्सव मनाया। भगवान को 56 भोग भी समर्पित किए गए। कथा शुभारंभ के पहले विधायक गोलू शुक्ला की धर्मपत्नी श्रीमती मुग्धा शुक्ला, संजय शर्मा, गणेश शास्त्री, नितिन शर्मा, मोहन खंडेलवाल, महंत यजत्रदास, राजेंद्र वर्मा, कैलाश पाराशर, वेदांत शर्मा, लीलाधर शर्मा, रामकुमार शर्मा, सुजीत गजेश्वर, तनय शर्मा, सहित अनेक श्रद्धालुओं ने व्यास पीठ का पूजन किया। राधा रानी महिला मंडल की ओर से श्रीमती वर्षा शर्मा, करुणा शर्मा, गीता व्यास, रुक्मणी शर्मा, उषा सोनी, चंदा खंडेलवाल, बबली खंडेलवाल, निर्मला सोलंकी, मधु सुगंधी, उर्मिला प्रपन्न, हंसा पंचोली, हेमलता वैष्णव, मधु गुप्ता, श्रेया शर्मा आदि ने आचार्यश्री की अगवानी की। मठ के पं. अमितदास महाराज ने बताया कि भागवत ज्ञान यज्ञ का यह क्रम 30 दिसम्बर तक प्रतिदिन दोपहर 4 से सायं 7 बजे तक जारी रहेगा। इस दौरान सोमवार को रुक्मणी विवाह एवं मंगलवार को सुदामा चरित्र जैसे उत्सव भी मनाए जाएंगे। मंदिर का वार्षिक अन्नकूट महोत्सव 31 दिसम्बर बुधवार को आयोजित होगा।
भागवत भूषण आचार्य पं. शास्त्री ने कहा कि भगवान की भक्ति कभी निष्फल नहीं होती। कृष्ण की बाल लीलाएं पूतना वध से शुरू होकर कंस वध तक जारी रही और सब में भक्तों के कल्याण का ही भाव है। बृज की भूमि आज भी भगवान की लीलाओं की साक्षी है जहां हजारों वर्ष बाद भी गोपीगीत, महारास और कालियादेह नाग के मर्दन के जीवंत उदाहरण मौजूद है। हमारी संस्कृति में कुछ भी कपोल-कल्पित नहीं है। जितने प्रसंग हमारे धर्मशास्त्रों में बताए गए है, उन सबके प्रमाण आज भी देखे जा सकते हैं। यह भारत भूमि का ही चमत्कार है कि यहां सबसे ज्यादा देवी – देवता अवतार लेते है। भक्तों की भी यही भूमि है और लीलाओं का अलौकिक मंचन भी भारत की पुण्यधरा पर ही होता है।
