हर्ष कुशवाह इंदौर
इंदौर नगर निगम दिन-प्रतिदिन नए कीर्तिमान स्थापित करता जा रहा है। कभी स्वच्छता में देश में नंबर-वन बनने का जश्न, कभी एक दिन में लाखों पेड़ लगाने के दावे, तो कभी पर्यावरण और विकास के नाम पर विश्व रिकॉर्ड। लगता है कि रिकॉर्ड बनाने की सूची अब लगभग पूरी हो चुकी थी, इसलिए अब नगर निगम ने एक नए क्षेत्र में अपनी प्रतिभा आज़माने का मन बना लिया है—भ्रष्टाचार में रिकॉर्ड बनाने का।

बड़े-बड़े प्रोजेक्ट हों या गली-मोहल्ले का छोटा सा काम, बिना झोल-झाल के मानो कुछ भी संभव नहीं रहा। काम की गुणवत्ता पर सवाल उठना अब आम बात हो गई है और कई जगह तो ऐसा प्रतीत होता है मानो काम सिर्फ कागज़ों में ही पूरा हो गया हो। कहीं किए गए कार्य को दोबारा तोड़ा जा रहा है, तो कहीं बिना काम हुए ही बिल पास होने की कहानियाँ हवा में तैर रही हैं। यह सब आखिर किसके पैसों से हो रहा है—उसी टैक्स देने वाली जनता के, जो उम्मीद करती है कि उसका पैसा विकास में लगेगा, प्रयोगशाला में नहीं।
गार्डन रिनोवेशन के नाम पर अच्छी-खासी बाउंड्री वॉल का प्लास्टर उखाड़कर दोबारा प्लास्टर करना भी अब विकास की श्रेणी में गिना जाने लगा है। शहर भर में इस तरह के “नवाचार” धड़ल्ले से चल रहे हैं, मानो यह सब किसी अदृश्य प्रतियोगिता का हिस्सा हो।
और इस पूरे तमाशे में शासन और प्रशासन की भूमिका भी कम दिलचस्प नहीं है। सब कुछ देखते-सुनते हुए भी हालात ऐसे हैं जैसे वे गाँधी जी के तीन बंदरों की भूमिका निभा रहे हों—न कुछ देखना, न कुछ सुनना और न कुछ कहना। सवाल बस इतना है कि क्या यह चुप्पी भी किसी रिकॉर्ड की तैयारी है, या फिर जनता को ही इस नए “विकास मॉडल” की आदत डालने की कोशिश?
*जल्द होंगे बड़े खुलासे !*
