रामकथा से तन को पुष्टि, मन को तुष्टि और बुद्धि को दृष्टि मिलती है : पं. भार्गव

इंदौर।
रामकथा से तन को पुष्टि, मन को तुष्टि और बुद्धि को दृष्टि मिलती है। रामकथा चित्त में परिवर्तन लाती है। चित्त में बदलाव आएगा तो चरित्र में भी आएगा ही। चित्त भगवान की कथा से जुड़ जाए तो तीन घंटे तक संसार याद नहीं आएगा। यह चरित्र परिवर्तन की कथा है। भगवान जब व्यापक होते हैं तो सारा संसार उनके वश में होता है। राम सच्चिदानंद है। ऐसा हुआ तो रामकथा हमें ब्रम्ह तक जरूर ले जाएगी। राम और भरत का मिलाप रामायण का अदभुत और श्रेष्ठतम प्रसंग है। घर-घर में राम और भरत जैसे भाई हों तो सारे विवाद ही खत्म हो जाएंगे, अव्वल तो होंगे ही नहीं। भाईयों के बीच प्रेम का सबसे श्रेष्ठ उदाहरण केवल रामायण और रघुकुल में ही मिल सकता है।
बर्फानी धाम के पीछे स्थित गणेश नगर में माता केशरबाई रघुवंशी धर्मशाला परिसर के शिव-हनुमान मंदिर की साक्षी में चल रही रामकथा में मंगलवार को प्रख्यात मानस मर्मज्ञ पं. मनोज भार्गव ने प्रभु श्रीराम के वनवास काल के विभिन्न प्रसंगों की व्याख्या के दौरान उक्त दिव्य विचार व्यक्त किए। ब्रह्मऋषि स्वामी बर्फानी दादा महाराज की प्रेरणा से हो रहे इस अनुष्ठान में आयोजन समिति के प्रमुख तुलसीराम रघुवंशी एवं संयोजक रेवतसिंह रघुवंशी के साथ वत्सल दुबे, चिंटू राठौर, केपी सिंह, महेश अग्रवाल, दुल्हेसिंह राठौर, कैलाश पटेल, अशोक हांडिया, नारायण सिंह रघुवंशी एवं राजेंद्र सिंह रघुवंशी सहित अनेक विशिष्टजनों ने व्यास पीठ एवं रामचरितमानस का पूजन किया। विद्वान वक्ता की अगवानी ठा. विजय सिंह परिहार, प्रवीण सिंह पंवार, बनेसिंह तंवर, श्रीराम यादव, दिलीप सिंह सोलंकी, सुरेश गुप्ता, मुन्ना विजयवर्गीय आदि ने की। संयोजक रेवतसिंह रघुवंशी के अनुसार कथा में बुधवार 7 जनवरी को पंचवटी निवास, गिद्धराज एवं शबरी चरित्र, 8 को श्रीराम–सुग्रीव मित्रता, 9 को रावण वध एवं रामराज्याभिषेक प्रसंगों की संगीतमय कथा प्रतिदिन दोपहर 1 से 5 बजे तक होगी।
पं. भार्गव ने कहा कि जिसका अंतःकरण निर्दोष हो, भगवान भी उसी के पास जाते हैं। हम उच्च पद, सत्ता, वैभव, ऐश्वर्य से संपन्न व्यक्ति से बिना पात्रता, योग्यता और सामर्थ्य के बहुत सी अपेक्षा करने लगते हैं। जिनके पास हमसे कम साधन है, उनके प्रति उपेक्षा का भाव रखना ही अज्ञानता है। हमारे मन में द्वेष और ईर्ष्या के भाव आ जाते हैं। वह हमें अपने कद से बड़ा नहीं होने देना चाहता। द्वेष और कलह का जन्म इसी भाव से होता है। दुनिया में कहीं भी ऐसा उदाहरण नहीं मिलता जहां किसी राजा ने खड़ाऊ रखकर राजपाट संभाला हो।
