सुख और दुःख हमारे कर्मों का ही फल, भगवान के शब्दकोश
में तो ऐसे कोई शब्द ही नहीं – स्वामी प्रणवानंद सरस्वती

इंदौर।
भगवान के शब्दकोष में सुख या दुख नाम का कोई शब्द है ही नहीं। सुख और दुख हमारे कर्मो का फल है। हम जैसे कर्म करेंगे, फल भी वैसे ही मिलेंगे। गंगा और अन्य नदियां तभी तक पूजनीय है, जब तक वे अपने किनारों की मर्यादा में बहती है। किनारे छोड़ने पर कोई भी उन्हें नहीं पूजता क्योंकि तब वही जीवनरेखा विनाश की बाढ़ लेकर आती है। मनुष्य के जीवन का भी यही सिद्धांत है। भगवान के अवतार सज्जनों के कल्याण और दुर्जनों के विनाश के लिए ही होते हैं। मानव का मूलधर्म हिंदू ही है। दया, करुणा, तितिक्षा, परमार्थ और भाईचारा इसके मूल तत्व हैं। भगवान के अवतार किसी एक वर्ग या जाति के लिए नहीं, सभी वर्णों और प्रत्येक व्यक्ति के उद्धार के लिए हुए हैं।
ये दिव्य विचार हैं अखंड प्रणव वेदांत आश्रम, झलारिया के महामंडलेश्वर स्वामी प्रणवानंद सरस्वती के, जो उन्होंने झलारिया बायपास स्थित रूचि लाइफ स्केप पर चल रहे भागवत ज्ञान यज्ञ में व्यक्त किए। अखंड प्रणव वेदांत आश्रम पर मुख्य यजमान समाजसेवी सुरेश-मृदुला शाहरा, श्रीमती कल्पना भाटिया एवं अन्य श्रद्धालुओं ने प्रारंभ में व्यासपीठ का पूजन किया। महामंडलेश्वर स्वामी प्रणवानंद सरस्वती यहाँ मंगलवार 13 जनवरी तक प्रतिदिन दोपहर 3 से सांय 7 बजे तक भागवत कथामृत की वर्षा करेंगे। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार कथा में शुकवार 9 जनवरी को भक्त प्रह्लाद एवं ध्रुव चरित्र, 10 को कृष्ण जन्मोत्सव, 11 को बाल लीला एवं गोवर्धन पूजन, 12 को रूक्मणी स्वयंवर तथा 13 जनवरी को सुदामा चरित्र एवं परीक्षित मोक्ष के साथ कथा का विश्राम होगा। कथा प्रसंगानुसार उत्सव भी मनाए जाएंगे। बुधवार 14 जनवरी को दोपहर 2 से 5 बजे तक हवन एवं पूर्णाहुति के साथ समापन होगा। आयोजन में बड़ी संख्या में शहर एवं अन्य क्षेत्रों के श्रद्धालु भागीदार बन रहे हैं।
महामंडलेश्वर जी ने कहा कि भागवत ग्रन्थ भी है और धर्म भी है। भागवत धर्म में भले ही जातियां भिन्न हों, मानवता और सनातन हिंदुत्व एक ही हैं। सामान्य वर्ग में जन्मा बालक भी उच्चतम अध्यात्मिक पद प्राप्त कर सकता है। हिंदू धर्म के निर्माण और संरक्षण में सभी वर्णों के महापुरुषों का योगदान रहा है। नारद, व्यास, वाल्मीकि, सूत आदि सभी महापुरुष सनातन हिंदू धर्म के शिल्पी और आधार स्तंभ हैं। भागवत वह कथा है जो जन्म-जन्मांतर के पुण्योदय के बाद नसीब होती है। स्वयं भगवान के श्रीमुख से जिस ग्रंथ की रचना हुई हो, वह कालजयी ग्रंथ ही होता है। भागवत को चाहे कल्पवृक्ष कह लें, या महासागर अथवा सदगुणों का भंडार – सबका सार यही है कि जीवन को मोक्ष की ओर प्रवृत्त करना है तो भागवत की शरण जरूरी है।
