झलारिया के रूचि लाइफ स्केप स्थित अखंड प्रणव वेदांत आश्रम पर चल रहे भागवत ज्ञान यज्ञ में हुई गोवर्धन पूजा

इंदौर । संसार की दृष्टि से भगवान की लीलाओं का चाहे जो अर्थ-अनर्थ निकाला जाए, यह शाश्वत सत्य है कि यदि हमारी भक्ति अडिग और अखंड रहेगी तो भगवान को हमारी रक्षा हेतु आना ही पड़ेगा। भगवान का अवतरण भक्तों की रक्षा और दुष्टों के नाश के लिए हुआ है। उनकी लीलाओं में प्राणीमात्र के प्रति सदभाव और कल्याण का चिंतन होता है। भक्ति निष्काम और निर्दोष होना चाहिए। भक्ति मनुष्य को निर्भयता प्रदान करती है।
ये प्रेरक विचार हैं अखंड प्रणव वेदांत आश्रम झलारिया के महामंडलेश्वर स्वामी प्रणवानंद सरस्वती के, जो उन्होंने बायपास स्थित रूचि लाइफ स्केप पर चल रहे भागवत ज्ञान यज्ञ में रविवार को बाल लीला एवं गोवर्धन पूजा प्रसंगों की व्याख्या के दौरान व्यक्त किए। अखंड प्रणव वेदांत आश्रम पर एम फॉर सेवा के प्रदेश प्रमुख स्वामी ऐश्वर्यानंद सरस्वती, स्वामी कृष्णानंद, स्वामी दत्तानंद एवं स्वामी अतुल महाराज के सानिध्य में गोवर्धन पूजा का उत्सव धूमधाम से मनाया गया। भगवान गिरिराज को 56 भोग लगाए गए। प्रारंभ में समाजसेवी सुरेश-मृदुला शाहरा, गीता भवन ट्रस्ट के मंत्री रामविलास राठी, योगेन्द्र भाटिया, मनोज गुप्ता, कमल राठी, कमलेश मंडन, श्रीमती कांता अग्रवाल, आनंद शर्मा, गोविंद सिंह, नीरज पाटीदार, आदि ने व्यासपीठ का पूजन किया। विद्वान वक्ता की अगवानी प्रदीप अग्रवाल, हंसमुख गज्जर, बाबूसिंह मंडलोई, अजय पानसरे, श्रीमती कशिश मोहन सतवानी ने की। समापन पर सैकड़ों भक्तों ने आरती में भाग लिया। महामंडलेश्वर स्वामी प्रणवानंद सरस्वती यहाँ 13 जनवरी तक प्रतिदिन दोपहर 3 से सांय 7 बजे तक भागवत कथामृत की वर्षा करेंगे। कथा में सोमवार 12 जनवरी को रूक्मणी स्वयंवर तथा 13 जनवरी को सुदामा चरित्र एवं परीक्षित मोक्ष के साथ कथा का विश्राम होगा। बुधवार 14 जनवरी को दोपहर 2 से 5 बजे तक हवन एवं पूर्णाहुति के साथ समापन होगा। आयोजन में बड़ी संख्या में शहर एवं अन्य क्षेत्रों के श्रद्धालु भागीदार बन रहे हैं।
महामंडलेश्वरजी ने कहा कि भगवान की भक्ति कभी निष्फल नहीं होती। कृष्ण की बाल लीलाएं पूतना वध से शुरू होकर कंस वध तक जारी रही और सब में भक्तों के कल्याण का ही भाव है। बृज की भूमि आज भी भगवान की लीलाओं की साक्षी है जहां हजारों वर्ष बाद भी गोपीगीत, महारास और कालियादेह नाग के मर्दन के जीवंत उदाहरण मौजूद है। हमारी संस्कृति में कुछ भी कपोल-कल्पित नहीं है। जितने प्रसंग हमारे धर्मशास्त्रों में बताए गए हैं, उन सबके प्रमाण आज भी देखे जा सकते हैं। यह भारत भूमि का ही चमत्कार है कि यहां सबसे ज्यादा देवी-देवता अवतार लेते है। भक्तों की भी यही भूमि है और लीलाओं का अलौकिक मंचन भी भारत की पुण्यधरा पर ही होता है।
