झलारिया के रूचि लाइफ स्केप स्थित अखंड प्रणव वेदांत आश्रम पर चल रहे भागवत ज्ञान यज्ञ में धूमधाम से मना रुक्मणी विवाह

इंदौर। हमारे धर्मग्रंथ सुषुप्त समाज को जागृत एवं चैतन्य बनाते हैं। मनुष्य का जीवन हमें केवल पशुओं की तरह व्यवहार करने के लिए नहीं, बल्कि सदभाव, परमार्थ और सेवा करूणा जैसे प्रकल्पों के लिए भी मिला है। भगवान अनुभूति का विषय है। हृदय में पवित्र संकल्प आयेंगें तो विचारों का प्रवाह भी निर्मल हो जाएगा। भगवान की लीलाओं के दर्शन एवं श्रवण से मन में पवित्र संकल्पों का सृजन होकर मन के विकार दूर होते हैं और शरीर की इंन्द्रियों पर सात्विक प्रभाव होता है। आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है कृष्ण-रूक्मणी विवाह। विवाह जैसे संस्कारों के कारण ही हमारे भारतीय समाज आज भी मर्यादित और शालीन बने हुए हैं। सही मायने में विवाह ही वह मान्यता है जो हमारे घरों को पाश्चात्य संस्कृति से बचाए हुए है।
ये प्रेरक विचार हैं अखंड प्रणव वेदांत आश्रम झलारिया के महामंडलेश्वर स्वामी प्रणवानंद सरस्वती के, जो उन्होंने बायपास स्थित रूचि लाइफ स्केप पर चल रहे भागवत ज्ञान यज्ञ में सोमवार को श्रीकृष्ण-रुक्मणी विवाह प्रसंग की व्याख्या के दौरान व्यक्त किए। अखंड प्रणव वेदांत आश्रम पर चल रहे इस भागवत ज्ञान यज्ञ में दिनोंदिन भक्तों की संख्या बढ़ रही है। सोमवार को कथा के दौरान रुक्मणी मंगल का उत्सव धूमधाम से मनाया गया। कृष्ण और रुक्मणी बने पात्रों ने एकदूजे को जैसे ही वरमाला पहनाई, आश्रम परिसर भगवान के जयघोष से गूंज उठा। बधाई गीतों और प्रसाद वितरण के साथ उत्सव का समापन हुआ। कथा शुभारम्भ के पूर्व समाजसेवी सुरेश-मृदुला शाहरा, गीता भवन ट्रस्ट के मंत्री रामविलास राठी, श्रीमती कल्पना भाटिया, प्रदीप अग्रवाल, मनोज रामनानी, डॉ. गोपाल गौतम, संतोष-कल्पना पाराशर, आनंद चौकसे, गोकुल सिसोदिया आदि ने व्यासपीठ का पूजन किया। विद्वान वक्ता की अगवानी कमल राठी, कमलेश मंडन, श्रीमती कांता अग्रवाल, आनंद शर्मा, गोविंद सिंह, नीरज पाटीदार, बाबूसिंह मंडलोई, अजय पानसरे ने की। समापन पर सैकड़ों भक्तों ने आरती में भाग लिया। महामंडलेश्वर स्वामी प्रणवानंद सरस्वती यहाँ मंगलवार तक प्रतिदिन दोपहर 3 से सांय 7 बजे तक भागवत कथामृत की वर्षा कर रहे हैं। कथा में मंगलवार 13 जनवरी को सुदामा चरित्र एवं परीक्षित मोक्ष के साथ कथा का विश्राम होगा। बुधवार 14 जनवरी को दोपहर 2 से 5 बजे तक हवन एवं पूर्णाहुति के साथ समापन होगा। आयोजन में बड़ी संख्या में शहर एवं अन्य क्षेत्रों के श्रद्धालु भागीदार बन रहे हैं।
महामंडलेश्वरजी ने कहा कि भगवान को धन सम्पत्ति नहीं, मन के श्रेष्ठ भाव चाहिए। वे छप्पन भोग के नहीं, हमारे प्रेम की भावना के भूखे हैं। रूक्मणी मगंल प्रसंग हमारी भारतीय संस्कृति और मर्यादा का गौरवशाली उजला पक्ष है। रूक्मणी विवाह आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है। कृष्ण योगेश्वर, लीलाधर और नटवर की यही विशेषता है कि वे कृपा वर्षा करते भी हैं तो पता ही नहीं चलते देते। हमारे सभी देवी-देवता बिना किसी भेदभाव के प्राणियों के उद्धार के लिए ही अवतरित होते हैं। पश्चिम संस्कृति में विवाह सात दिन, सात सप्ताह, सात माह में भी टूट सकते हैं लेकिन भारतीय परिवारों में विवाह सात जन्मों के लिए होते हैं। पूरब और पश्चिम की विवाह पद्धति में यही अंतर हमें समझना होगा।
