
पतन से बचने के लिए अहंकार को कभी अपने पास नहीं फटकने दें – पं. शास्त्री
इंदौर। सुख और दुख जीवन के क्रम हैं, जिनसे कोई भी बच नहीं सकता। संसार को दुखों का महासागर माना गया है। भगवान की सभी लीलाएं समाज के लिए कल्याणकारी होती हैं। इन लीलाओं को सृष्टि की रचना करने वाले ब्रम्हाजी भी नहीं समझ सकें, फिर हम सब तो साधारण मनुष्य हैं। भगवान के पास दुख नाम का कोई शब्द है ही नहीं। सुख और दुख हमारे अंतर्मन की उपज हैं। हमारी जितनी कामनाएं बढ़ेंगीं, उतना ही दुख भी बढ़ेगा। पतन से बचने के लिए अहंकार को कभी भी अपने पास फटकने नहीं देना चाहिए। अहंकार ही मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है।
जूनी इंदौर मुक्ति धाम सेवा समिति के तत्वावधान में चल रहे भागवत ज्ञानयज्ञ में भागवताचार्य पं. श्याम सुंदर शास्त्री ने मंगलवार को उक्त प्रेरक विचार व्यक्त किए। कथा शुभारम्भ के पूर्व आचार्य इंद्रानंद क्षोत्रिय , अशोक– संध्या सारडा, प. शांतिलाल व्यास, ओपी मालू, अरविन्द शर्मा , रामेश्वर कुमावत, प्रमोद खटोड़, प्रेम चौहान, ओमप्रकाश सोनकर, सहित अनेक भक्तों ने व्यास पीठ का पूजन किया। विद्वान वक्ता की अगवानी गोविन्द राठी, अनिल राठौड़, रूपेश सोनगरा , मनोरमा शर्मा, सरस्वतीदेवी सहित सैकड़ों भक्तों ने की। कथा के दौरान भगवान कृष्ण के जन्मोत्स,बाल लीलाओं और गोवर्धन पूजा के प्रसंग भी मनाए गए। अनेक श्रद्धालु प्रतिदिन महामृत्युंजय मंदिर में बैठकर पूजा अर्चना भी कर रहे हैं। मोक्ष धाम परिसर स्थित महामृत्युंजय मंदिर में पं. राजेश तिवारी एवं अन्य विद्वानों द्वारा भागवत का मूल पारायण भी किया जा रहा है। सोमवार को राष्ट्र वन्दना के पश्चात कथा प्रसंगानुसार राम एवं कृष्ण जन्मोत्सव भी मनाए गए। कथा में 28 जनवरी को रुक्मणी विवाह का प्रसंग मनाया जाएगा। संगीतमय कथा 29 जनवरी तक प्रतिदिन दोपहर 1 से 4 बजे तक होगी। 30 जनवरी को मोक्ष धाम पर रखी हुई दिवंगतों की अस्थियों का शास्त्रोक्त विधि से विसर्जन कर दिया जाएगा। समिति की ओर से दिवंगतों के परिजनों से आग्रह किया गया है कि वे अपने प्रियजनों, स्वजनों की अस्थियाँ 30 जनवरी के पहले मोक्ष धाम से ले जाएँ।
पं. शास्त्री ने कहा कि भगवान की लीलाओं को समझने के लिए अंतर्मन की दृष्टि चाहिए। देवराज इंद्र के अहंकार को नष्ट करने के लिए भगवान ने गोवर्धन पर्वत को एक अंगुली पर उठाकर समूचे बृज को बचा लिया बल्कि अपने साथ बाल ग्वालों को भी जोड़कर यह संदेश भी दिया कि बड़ी से बड़ी पहाड़ जैसी विपत्ति को भी सब लोग मिलकर एक अंगुली के दम पर दूर कर सकते हैं। अहंकार से बचना ही सबसे बड़ी चुनौती है।
