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जूनी इंदौर मुक्ति धाम पर भागवत कथा में पहली बार हुआ भंडारा, निकली शोभा यात्रा – आज सुबह होगा अस्थियों का विसर्जन
इंदौर।
सच्चा मित्र वही होता है जो अपनी कमियों एवं कमजोरियों से हमें आगाह करें। मित्रता में छल-कपट नहीं होना चाहिए। आज मैत्री को नए संदर्भों में परिभाषित करने की जरूरत है। राजा-प्रजा के बीच निष्कपट मैत्री का भाव होना चाहिए। कथा में हम तो बैठ लिए, अब कथा को भी अपने अंतर्मन में बैठाने की जरूरत है।
जूनी इंदौर मुक्ति धाम सेवा समिति के तत्वावधान में चल रहे भागवत ज्ञानयज्ञ में भागवताचार्य पं. श्याम सुंदर शास्त्री ने गुरुवार को उक्त प्रेरक विचार व्यक्त किए। कथा शुभारम्भ के पूर्व समाजसेवी प्रमोद रामेश्वर खटोड, राहुल सोनकर, ओमप्रकाश मालू, प्रेम चौहान, ओमप्रकाश सोनकर, रणजीत सोनकर पहलवान, राजेश जोशी, जगदीश पांचाल सहित अनेक भक्तों ने व्यास पीठ का पूजन किया। संयोजक अशोक सारडा एवं राजेश जोशी ने बताया कि जूनी इंदौर मोक्ष धाम पर सम्पन्न हुई इस भागवत कथा का समापन गुरुवार को लगभग 2 हजार भक्तों के लिए महाप्रसादी के साथ सम्पन्न हुआ। उत्सव के लाभार्थी प्रमोद खटोड एवं राहुल सोनकर मित्र मंडल के सदस्यों ने पूरे मनोयोग से सहयोग प्रदान किया।
कथा के दौरान भगवान एवं उनके बाल सखा सुदामा की मित्रता का जीवंत उत्सव भी मनाया गया। कृष्ण-सुदामा मिलन का हृदयस्पर्शी चित्रण सुनकर अनेक आंखे छलछला उठी। इस दौरान मोक्ष धाम परिसर स्थित महामृत्युंजय मंदिर पर पं. राजेश तिवारी एवं अन्य विद्वानों द्वारा किए जा रहे भागवत के मूलपारायण का भी आज समापन हो गया। समापन प्रसंग पर मोक्ष धाम परिसर में भागवतजी की शोभा यात्रा भी निकाली गई। समापन अवसर पर जूनी इंदौर मोक्ष धाम पर पहली बार भंडारे का आयोजन भी सम्पन्न हुआ। शुक्रवार 30 जनवरी को सुबह 9 बजे मोक्ष धाम पर रखी हुई दिवंगतों की अस्थियों का शास्त्रोक्त विधि से पूजन कर नर्मदा में विसर्जन के लिए खेड़ीघाट के लिए विदा किया जाएगा।
पं. शास्त्री ने कहा कि कृष्ण-सुदामा की मैत्री राजमहल और झोपड़ी के मिलन का अनुपम दृष्टांत है। आज के युग में मित्रता के मायने बदल गये हैं। स्वार्थ के रिश्तों को मैत्री का नाम नहीं दिया जा सकता। कृष्ण राजा थे और सुदामा अंतिम छोर पर खड़ी प्रजा। आज के राजा भी यदि राजभवनों के दरवाजे सुदामाओं के लिए खोल दें तो प्रजातंत्र फलीभूत हो जाएगा।
