मेरा इंदौर ..! जो संवेदना के लिए जाना जाता है , वो हमारा इंदौर जो स्वक्षता में भारत वर्ष में जाना जाता है ! अपना वो इंदौर जो जश्न मनाने राजबाड़े पर उमड़ पड़ता है ! हमारा वो इंदौर जो परिवार सहित होली के रंग बिखेरता है .. आज गमगीन माहौल में अपनों को समेट रहा है संख्याओं के साथ अपने परिवार का कम होना आंकड़ो और सहयोग का संयोग कैसे हो सकता है ? जान की क़ीमत संख्या या चंद रुपैया कैसे हो सकती है ? ये इंदौरी दिल समझ नहीं पा रहा है ! इंदौरी वह है जो दिल से बिहार यूपी को भी अपना बना लेता है और जो एक बार यहाँ आया वो इंदौर का हो गया । ये मेरा इंदौर है …

जिसने मुखिया को खोया है उसकी अंतरात्मा जानती है । दिल कहता है सिर्फ वो बैठे ही रहते तो इशारों में मर्यादा और विश्वास बना रहता .. घर में रहने का सबब और जीवन का मकसद कायम रहता की वो है तो सब कुछ है .. पर आज शून्य होती संवेदनाओं ने अपनों को आँकड़ो में खो दिया ।
जल त्रासदी मानो एक अवसर बनकर आई राजनीति में अपना क़द बढ़ा करने की और जीवन में अपनो का मोल करने के लिए इन सब के बीच ज़िम्मेदार गुनाहागार कन्ही खो गए और उनकी तलाश आज इंसानियत को है ? इंसानियत और संवेदनाएँ जो आज चीख चीख कर कह रही है बिखरे हुए परिवार की क़ीमत दो चार लाख कैसे हो सकती है ? मेरी अपनी की गिनती आँकड़ो में कैसे हो सकती है ? सच समझ नहीं आता पर क़द बढ़ाने के लिए और सच छुपाने के लिए राजनीति अच्छी है !
संवेदना खो रही है मन में कसोट है अपने खो गए पर कुछ तो मिल गया ? इंसानियत शर्मसार हो गई । जननेता के संघर्ष और साहस आज नाकाम लगने लगे । अपनों के बीच अपनों के लिए जो सदा खड़े रहने वाले अब शायद ही होंगे ? जब अपनों की गिनती रुपये में हम करने लगे..
बात गहरी है पर संवेदना में ज़िंदगानी है और आँकड़ो में हेवानीयत है । आज आँकड़ो के खेल में प्रशासन जिम्मेदारीपूर्ण रवैया और राजनीति में शासन की भूमिका खो गई तो वन्ही इंसानियत की अहमियत अपनी पहचान प्रशासनिक व्यवस्था में सहयता के बीच खो रही है है विडंबना ये है की अपनों के खोने का ग़म कान्हा मिलेगा ..आज हर दिल ये ढूंड रहा है ? समझ से परे है वो टीआरपी जो मौत के आँकड़ो और ग़म के आंसुओ पर भारी है । समझ से परे है प्रशासन का वो स्पष्टिकरण जो आँकड़ो को बढ़ने से रोकने के लिए दिया जाता है एक बार उस नन्ही तोतली आवाज की गूंज भी सुन लो जो दादू नान्नू के साथ अपनों को खोज रही है शायद कन्ही कोई ईसानियत जवाब दे सके ।
विजय दुबे
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