” — लेखक पंकज व्यास का राष्ट्र के नाम संदेश
रतलाम/मध्य प्रदेश। सुप्रसिद्ध लेखक और विचारक पंकज व्यास ने अपने नवीनतम आलेख के माध्यम से राष्ट्र की एकता और अखंडता को सुदृढ़ करने के लिए ‘सर्व धर्म सम्भाव’ को आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बताया है। श्री व्यास का मानना है कि भारत की पावन मिट्टी की तासीर हमेशा से वैश्विक एकता की रही है और वर्तमान दौर में वैचारिक संकीर्णता को त्यागकर ‘आत्मीय स्वीकार्यता’ को अपनाना ही एकमात्र मार्ग है।
सहिष्णुता नहीं, आत्मीय स्वीकार्यता: श्री व्यास ने अपने लेख में स्पष्ट किया कि ‘सर्व धर्म सम्भाव’ का अर्थ केवल धार्मिक सहनशीलता (Tolerance) नहीं है, बल्कि यह उससे कहीं ऊपर ‘आत्मीय स्वीकार्यता’ (Acceptance) का भाव है। जिस प्रकार नदियाँ अंततः सागर में विलीन होती हैं, वैसे ही सभी पूजा-पद्धतियों का मूल ध्येय मानवता की सेवा है।
विविधता ही भारत की असली शक्ति: लेखक के अनुसार, मंदिर की आरती, मस्जिद की अज़ान, गुरुद्वारे की अरदास और चर्च की प्रार्थनाओं का संगम ही वह सुरम्य संगीत है जो भारत को विश्व में अद्वितीय बनाता है। यह विविधता हमारी कमजोरी नहीं, बल्कि वह शक्ति है जो राष्ट्र की नींव को गहरा करती है।
युवा पीढ़ी का उत्तरदायित्व: पंकज व्यास ने युवा पीढ़ी का आह्वान किया है कि वे सोशल मीडिया के भ्रामक प्रचारों और संकुचित विचारधाराओं से ऊपर उठकर ‘मानवता’ के धर्म को पहचानें। उन्होंने एक ऐसे समावेशी वातावरण के निर्माण पर जोर दिया जहाँ पंथ किसी भेदभाव का आधार न बने।
विकास के लिए समरसता अनिवार्य: जब समाज व्यर्थ के विवादों से मुक्त होकर शिक्षा, स्वास्थ्य और तकनीकी नवाचार जैसे सृजनात्मक कार्यों में अपनी ऊर्जा लगाता है, तभी राष्ट्र वास्तविक उन्नति करता है।
लेखक का संकल्प:
लेखक पंकज व्यास ने विश्वास व्यक्त किया है कि जिस दिन हम ‘परधर्म’ को भी अपने धर्म के समान सम्मान देने लगेंगे, उसी दिन भारत वास्तविक अर्थों में ‘विश्व गुरु’ के पद पर प्रतिष्ठित होगा। उन्होंने अपने विचारों को इन पंक्तियों के साथ विराम दिया:
”मजहब तो जोड़ता है, तोड़ना सियासत का काम है, इंसानियत ही सबसे ऊँचा, सच्चा मजहब और नाम है।”
