कैट रोड, हवा बंगला स्थित हरिधाम आश्रम गूँज रहा हनुमत महायज्ञ की चौपाइयों और राम कथा की मंगल ध्वनि से

इंदौर राम और सीता की जोड़ी को भारतीय संस्कृति का आदर्श युगल माना जाता है लेकिन अर्थ प्रधान इस युग में पाश्चात्य संस्कृति हावी हो रही है। विवाह के नाम पर प्रर्दशन पर फिजूलखर्ची की प्रवृत्ति बढ़ रही है। धन कमाने की होड़ में भक्ति के लिए समय निकालना भी अब दुर्लभ होता जा रहा है। सीता लक्ष्मी का स्वरुप हैं और राम विष्णु का। हमारा दाम्पत्य जीवन कैसा होना चाहिए, यह देखना है तो राम और सीता की जोड़ी को देखें। दाम्पत्य जीवन स्नेह, सदभाव, विश्वास, त्याग और समर्पण से ही सार्थक बनेगा। राम-सीता के युगल ने भारतीय संस्कृति में ऐसे आदर्श मानक स्थापित किए हैं कि हजारों वर्ष बाद भी हम इस युगल को भारतीय समाज का सबसे श्रेष्ठ और आदर्श युगल मानते हैं। जहाँ राम हैं, वहां विश्राम भी है।
ये प्रेरक विचार हैं श्रीधाम वृन्दावन के प्रख्यात कथाकार पं. श्रीराम प्रपन्नाचार्य महाराज के, जो उन्होंने हवा बंगला, कैट रोड स्थित हरिधाम आश्रम पर मंगलवार शाम को राम कथा में राम-सीता स्वयंवर सहित विभिन्न प्रसंगों की व्याख्या के दौरान व्यक्त किए। कथा में सीता स्वयंवर का प्रसंग सुनाते हुए विद्वान वक्ता ने भारतीय सनातन संस्कृति की महत्ता और परम्पराएं भी बताई। ब्रज से आए भजन गायकों और संगीतज्ञों ने आज भी अपने मनोहारी भजनों से समूचे पंडाल को थिरकाए रखा। प्रारंभ में आश्रम के अधिष्ठाता महंत शुकदेवदास महाराज के सानिध्य में डॉ. सुरेश चोपड़ा, संजय अग्रवाल, सुधीर अग्रवाल, गोपाल गोयल, सीताराम नरेडी, ओमप्रकाश अग्रवाल, किशोर गोयल, विजय सिंह राणा एवं गुमान सिंह ठाकुर आदि ने व्यास पीठ का पूजन किया। कथा श्रवण के लिए प्रतिदिन शहर के अलावा आसपास के 25 गांवों के श्रद्धालु आ रहे हैं जो सुबह 8 से दोपहर 1.30 बजे तक हनुमत महायज्ञ में और दोपहर में 3 बजे से शाम 6 बजे तक श्रीराम कथा में अपनी भागीदारी दर्ज करा रहे हैं।
विद्वान वक्ता ने कहा कि गृहस्थ जीवन की गाड़ी पति-पत्नी के दो पहियों के बीच समन्वय और संतुलन से ही चलती है। एकदूसरे के प्रति प्रेम, स्नेह और विश्वास के बूते पर ही गृहस्थ जीवन आगे बढ़ता है। दाम्पत्य जीवन वहीं सफल हो सकता है, जहाँ विश्वास, त्याग और समर्पण साथ रहते हों। सम्पत्ति की चकाचौंध के बीच यदि अपनी संस्कृति भी कायम रहे तो घर-घर में राम-सीता जैसे युगल हो सकते हैं। सीता भारतीय नारी का सबसे श्रेष्ठ और आदर्श उदाहरण है।
हनुमत महायज्ञ – आश्रम पर यज्ञाचार्य पं. ललित पाठक के निर्देशन में 51 विद्वानों ने आश्रम परिसर में निर्मित यज्ञशाला में चल रहे हनुमत महायज्ञ में “कवन सो काज कठिन जग माही, जो नहीं होइ तात तुम पाहीं” महामंत्र से विश्व शांति, जन कल्याण एवं परिवार, समाज एवं राष्ट्र में सुख, शांति एवं सदभाव की कामना से आहुतियाँ समर्पित की। यहाँ प्रतिदिन 1 लाख 60 हजार आहुतियाँ विद्वानों एवं यजमानों द्वारा समर्पित की जा रही हैं। अब तक यहाँ 11 लाख लक्ष्य के मुकाबले 6 लाख 40 हजार आहुतियाँ समर्पित की जा चुकी हैं। महायज्ञ प्रतिदिन सुबह 8 से दोपहर 1.30 बजे तक हो रहा है। यज्ञशाला की परिक्रमा में भी दिनोंदिन भक्तों की संख्या बढती जा रही है। विभिन्न बीमारियों से पीड़ित लोगों के अलावा बड़ी संख्या में दिव्यांग, दृष्टिहीन एवं अन्य श्रद्धालु भी परिक्रमा के लिए आ रहे हैं। यज्ञशाला विद्वान ब्राह्मणों के श्रीमुख से रामायण की चौपाइयों से गुंजायमान हो रही है।
