
इंदौर हमारी भक्ति तभी सार्थक होगी जब मन और बुद्धि में श्रेष्ठ समन्वय होगा। निष्काम भक्ति को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। भगवान को 56 भोग नहीं हमारा शुद्ध और पवित्र मन चाहिए। वे हमें मान देकर हमारा मन चाहते हैं। जीवन की धन्यता सेवा और सत्कर्मों से ही संभव है। प्रभु के प्रति समर्पण भाव के बिना भक्ति संभव नहीं है। भक्ति के बीज बचपन में ही अंकुरित हो जाना चाहिए, पचपन में नहीं।
ये दिव्य विचार हैं प्रख्यात भागवताचार्य पं. आदित्य मुखिया के, जो उन्होंने मंगलवार को श्री दशा नीमा पंचायत ट्रस्ट द्वारा मालगंज चौराहा स्थित नवश्रृंगारित धर्मशाला भवन पर ट्रस्ट के हीरक जयंती महोत्सव एवं पुरुषोत्तम मास के उपलक्ष्य में चल रहे भागवत कथा ज्ञान यज्ञ में बालक ध्रुव की भक्ति एवं नरसिंह अवतार प्रसंगों के दौरान व्यक्त किए। कथा में पहले दिन से ही मनोहारी भजनों पर भक्तों के नाचने-गाने का सिलसिला चल रहा है। कथा शुभारंभ के पूर्व संयोजक सतीश नीमा “मालक”, दशा नीमा प्रगति मंच के पुष्पेन्द्र नीमा, रोहित नीमा, अजय नीमा आदि ने व्यास पीठ का पूजन किया। विद्वान वक्ता की अगवानी सत्यनारायण नीमा, कमल नीमा, राजेंद्र नीमा, गिरधर गोपाल नीमा, अशोक महेश नीमा आदि ने की। मालवा ज़ोन नीमा समाज एवं समाज की विभिन्न संस्थाओं की ओर से भी व्यास पीठ का पूजन किया गया। संचालन अजय जौहरी ने किया। कथा में दिनोंदिन भक्तों की संख्या बढती जा रही है। संयोजक सतीश नीमा मालक एवं अध्यक्ष सत्यनारायण नीमा ने बताया कि कथा में बुधवार 3 जून को वामन अवतार, श्रीराम अवतार, कृष्ण जन्म एवं नंद महोत्सव प्रसंगों की कथा होगी। कथा प्रतिदिन शाम 4 से 7 बजे तक चल रही है। कथा में 4 जून को बाल लीला एवं गोवर्धन पूजा, 5 को रासलीला एवं रुक्मणी विवाह तथा 6 जून को सुदामा चरित्र प्रसंग के साथ पूर्णाहुति होगी।
भागवताचार्य पं. मुखिया ने कहा कि हम सबके जीवन में भी बालक ध्रुव की तरह सुरुचि और सुनीति नामक दो माताएं होती हैं। हमें भी इन दोनों में से किसी एक का चयन करने का अवसर कई बार आ खड़ा होता है। याद रखें कि सुरुचि अर्थात संसार के भोग विलास और भौतिक साधन जिनसे सुख तो मिल सकता है, शांति नहीं मिलती। जीवन का लक्ष्य सुनीति के मार्ग पर चलकर ही मिल सकता है। परमात्मा का ऐश्वर्य सर्वोपरि होता है। संसार के धन, दौलत और भौतिक संसाधनों की चकाचौंक के सामने परमात्मा का ऐश्वर्य सर्वाधिक आभावान होता है।
