
दलाल बाग में चल रही चातुर्मास की धर्मसभा में हो रही प्रेरक और ओजस्वी प्रवचनों की अमृत वर्षा – शिविर की मैराथन तैयारियां
इंदौर पेड़ को पहले अपनी जड़ें धरती में अंदर तक मजबूत करना पड़ती है, उसके बाद ही वह आकाश की ओर बढ़ सकता है। मनुष्य जीवन में भी यही सिद्धांत लागू होता है कि यदि हमें ऊँचाइयों को छूना है तो अपनी जड़ों को मजबूत करना होगा। ऊँचा वही उठ पाएगा जिसकी जड़ें जमीन के अंदर तक गहरी और मजबूत हों। बाहरी सफलता से पहले अंतर्रात्मा की नींव और मन की शांति मजबूत करना जरुरी है। हम अपनी ख़ुशी, दूसरों की प्रशंसा और बाहरी दिखावे से जोड़ बैठे हैं जबकि वास्तविक ख़ुशी धर्म के भीतर उतरने और स्वयं को पहचानने से मिलेगी। सच्ची शांति का जन्म तभी होगा जब हमारा मन तृप्त होगा। मन की भूख समाप्त हुए बिना मन स्वयं को तृप्त करना नहीं सीखेगा।
ये दिव्य और प्रेरक विचार हैं संत शिरोमणि प.पू. विद्यासागर म.सा. के परम प्रभावक शिष्य और राष्ट्रसंत मुनि पुंगव प.पू. श्री सुधासागर महाराज के, जो उन्होंने सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में वीआईपी रोड स्थित किला मैदान, दलाल बाग परिसर में निर्मित विद्या-सुधा मंडप में चल रहे चातुर्मास महोत्सव की धर्मसभा में व्यक्त किए। सभा का शुभारंभ मंगलाचरण एवं पाद प्रक्षालन के साथ हुआ। प्रारम्भ में आयोजन समिति की ओर से चक्रवर्ती अध्यक्ष नवीन-शिवानी गोधा, सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद-अंतिका गोधा, महामंत्री हर्ष-तृप्ति जैन, मनीष-सपना गोधा एवं आकाश-दीपिका जैन कोयला आदि ने देशभर से आए साधकों की अगवानी की। इस अवसर पर महोत्सव समिति के अध्यक्ष अशोक डोसी, विजय पाटोदी, हुकमचंद जैन काका, संजय पाटोदी, प्रिंसपाल टोंग्या, भूपेंद्र भोपाली, सौरभ बडजात्या, संजय पांड्या, मयंक जैन, विकास पाटोदी एवं कमल अग्रवाल सहित अनेक सहयोगी बंधुओं ने सभा की व्यवस्थाओं में सहयोग प्रदान किया। मीडिया प्रभारी राहुल सेठी ने बताया कि दलाल बाग पर पर्यूषण महापर्व पर 15 सितम्बर से होने वाले श्रावक संस्कार शिविर के प्रति देशभर के साधकों का जबरदस्त उत्साह देखने को मिल रहा है। शिविर की तैयारियों को लेकर प्रतिदिन विभिन्न जैन संगठनों की बैठकों का मैराथन सिलसिला भी चल रहा है। सभा में दिनोंदिन देशभर से आने वाले साधकों का सैलाब उमड़ रहा है। दलाल बाग पर प्रतिदिन सुबह 8 से 9.30 बजे तक राष्ट्रसंत के प्रवचनों की अमृत वर्षा का क्रम जारी है।
राष्ट्रसंत प.पू. सुधासागर म.सा. ने कहा कि हम सुबह प्रसन्न होकर उठते हैं लेकिन यदि टूथब्रश जैसी छोटी वस्तु टूट जाए तो हमारा क्रोध पूरे वातावरण को बदल देता है। इससे पता चलता है कि हमारी शांति कितनी कमजोर है। इतनी छोटी बात से यदि हमारी शांति छीन सकती है तो हमें अपनी शांति की वास्तविक मजबूत पर विचार करना होगा। हमें अपनी कमियों को पहचानना होगा। दूसरों में दोष नहीं, गुण खोजना होंगे। जो मिला है उसका आभार मानना होगा। जीवन में आने वाली कठिनाइयों और समस्याओं को देखने की दृष्टि बदलना होगी। बुराई से घृणा मत करो, उसे खाद बनाना सीखो। जिस तरह किसान कचरे और गंदगी से खाद बनाकर अच्छी फसल पैदा कर लेता है उसी तरह हमें भी अपने जीवन में आने वाले विरोध, अपमान, कठिनाई और संकट को खाद बनाकर जीवन की फसल को उन्नति में बदलने का पुरुषार्थ करना चाहिए। हमें जो कुछ मिला है या मिल रहा है, उसे छोटा मत समझिए, उसके प्रति आभार व्यक्त करना सीखिए। बाजरे की रोटी मिले तो उसे छोटा मत समझिए, झोपडी मिली है तो उसका धन्यवाद कीजिए, साईकिल या पुरानी गाड़ी मिली है तो उसका अपमान मत कीजिए और जो कुछ भी मिल रहा है उसमें खुश रहना सीखिए। स्वयं को कोसना दूसरे के अभिशाप से भी ज्यादा खतरनाक है। मेरी किस्मत ख़राब है, मेरे साथ ही बुरा होता है- ऐसे विचार व्यक्ति को भीतर से कमजोर करते हैं। इसकी जगह मेरे पास बहुत कुछ है, मुझे भगवान मिले, गुरु मिले, धर्म मिला और मैं स्वयं मिला, उसके लिए मैं आभारी हूँ- ऐसा भाव होना चाहिए।
