दूल्हे विष्णुजी की निकली बारात, गन्ने के मंडप में
हुआ कन्यादान – विद्याधाम गूंज उठा जयघोष से

इंदौर, 1 नवम्बर। विमानतल मार्ग स्थित श्री श्रीविद्याधाम पर देवउठनी एकादशी के उपलक्ष्य में शनिवार को गोधूलि बेला में तुलसी और भगवान शालिग्राम का विवाह धूमधाम से संपन्न हुआ। इस दौरान महामंडलेश्वर स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती के सानिध्य में भगवान विष्णु को दूल्हे के रूप में श्रृंगारित कर आश्रम परिसर में रथ-बग्घी तथा बारातियों सहित चल समारोह निकाला गया। तुलसी को भी दुल्हन के रूप में सजा कर गन्ने एवं चुनरी के मंडप में विराजित कर कन्यादान किया गया। सैकड़ों श्रद्धालु इस विवाह के साक्षी बने। सम्पूर्ण मंदिर परिसर आज विद्युत एवं पुष्प सज्जा से आलोकित बना रहा।
आश्रम परिसर स्थित शालिग्राम मंदिर पर सायं 5 बजे से ही विवाह उत्सव की तैयारियां शुरू हो गई थी। आश्रम परिवार के सुरेश शहारा, पं. दिनेश शर्मा, राजेन्द्र महाजन, रमेश पसारी, रमेशचंद्र राठौर, संजय पंडित, सुरेश शर्मा, चंदन तिवारी, सुश्री उमा शुक्ला सहित स्वामी गिरिजानंद सरस्वती वेद वेदांग विद्यापीठ के वेदपाठी छात्र भी बारात में शामिल हुए। महामंडलेश्वर स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती ने मस्तक पर लड्डू गोपाल को एक बड़े थाल में विराजित कर सुसज्जित शोभायात्रा के रूप में निकाला। इस बीच रंगारंग आतिशबाजी और भजनों की मनोहारी स्वर लहरियों पर मेहमान नाचते-गाते रहे। दुल्हन पक्ष की ओर से बारातियों का पुष्प वर्षा कर स्वागत किया गया और उन्हें गन्ने के मंडप में विराजित किया गया। भगवान शालिग्राम एवं तुलसी के विवाह की रस्म आचार्य पं. राजेश शर्मा के निर्देशन में 11 विद्वानों ने संपन्न कराई। स्वामी गिरिजानंद सरस्वती वेद वेदांग विद्यापीठ के वेदपाठी बटुकों द्वारा वैदिक मंगलाचरण के बीच विवाह संपन्न होते ही सम्पूर्ण परिसर जयघोष से गूंज उठा। शहर के अनेक विद्वानों ने भी शालिग्राम मंदिर आकर पूजा-अर्चना की।
10 वर्ष पहले हुई स्थापना, 12 हजार 501 शिलाएँ लाई गईं – यह जम्मू के रघुनाथ मंदिर के बाद देश का दूसरा शालिग्राम मंदिर है, जिसकी स्थापना 10 वर्ष पूर्व जून 2015 में आश्रम के न्यासी पूनमचंद अग्रवाल ने आश्रम के संस्थापक ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी गिरिजानंद सरस्वती “भगवन” की प्रेरणा से कराई है। मंदिर के पुजारी पं. अश्विन भारद्वाज ने बताया कि यहाँ नेपाल की गण्डकी नदी से १२ हजार ५०१ शालिग्राम शिलाएँ लाकर स्थापित की गई हैं। भगवान महाविष्णु यहाँ अपने दस अवतारों, मत्स्य, कुर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि के साथ विराजमान हैं। इस मंदिर की 11 परिक्रमा करने मात्र से प्राणी को समूची पृथ्वी की सवा लाख परिक्रमा करने के समान पुण्यलाभ प्राप्त होने की बात शास्त्रों में कही गई है।
