खजराना गणेश मन्दिर पर चल रहे नर्मदा चिंतन ज्ञान यज्ञ में विद्वान वक्ता ने बताई माँ नर्मदा की विभिन्न लीलाएँ – मनाया प्राकट्य उत्सव

इंदौर पुण्यसलिला माँ नर्मदा का पुण्य प्रताप युगों-युगों से भारतीय समाज, धर्म संस्कृति और जीवमात्र को जीवन प्रदान करते आ रहा है। नर्मदा के तट पर मनुष्य और ऋषि-मुनि तो ठीक, देवता भी तप करने आते हैं। राम-रावण युद्ध के दौरान जब हनुमानजी पर हजारों ब्रह्म राक्षसों के वध का पाप चढ़ गया था तब उन्हें भी भगवती नर्मदा के तट पर आकर तपस्या करना पड़ी तब कहीं वे श्रापमुक्त हुए। नर्मदा केवल जलधारा नहीं, प्रभु के प्रेम, भक्ति, श्रद्धा, विश्वास और जीवन के प्रवाह की ऐसी धारा है जिसके तट पर पहुंचकर हर कोई हर तरह के पाप, ताप और संताप से मुक्त बन सकता है। नर्मदा की जितनी महिमा कही जाए, उतनी कम ही होगी। माँ की महिमा का बखान करना देवताओं के बूते से भी बाहर की बात है। देवता भी माँ नर्मदा के तट पर तपस्या करने आते हैं।
नर्मदा परिक्रमावासी आचार्य पं. रविकांत शास्त्री ने खजराना गणेश मन्दिर स्थित सत्संग सभागृह पर अ.भा. दादा गुरु परिवार इंदौर नर्मदा मिशन की मेजबानी में चल रहे नर्मदा चिंतन ज्ञान यज्ञ में शुक्रवार को माँ नर्मदा की लीलाओं की व्याख्या के दौरान उक्त ओजस्वी और प्रेरक विचार व्यक्त किए। कथा शुभारंभ के पूर्व कैलाश बंसल, अनिल अग्रवाल, शिव जिंदल, मधुरम अग्रवाल, नितिन विजयवर्गीय, शाश्वत शुक्ला, देवांग शर्मा आदि ने व्यास पीठ एवं नर्मदा पुराण ग्रन्थ का पूजन किया। समाजसेवी राजेंद्र बंसल एवं नित्यम बंसल ने बताया कि संध्या को माँ नर्मदा प्राकट्य उत्सव भी मनाया गया। इस दौरान इधिका नित्यम बंसल ने माँ नर्मदा के रूप में प्रकट होकर सैकड़ों भक्तों को आशीर्वाद प्रदान किए। भक्तों ने भी नर्मदे हर और माँ नर्मदा के जयघोष के बीच नाचते-गाते हुए उत्सव को आत्मसात किया। कथा श्रवण के लिए दिनोदिन भक्तों का सैलाब बढ़ता जा रहा है। देश के तपोनिष्ठ संत दादागुरु भी इस पावन कथा में सानिध्य प्रदान करने 10-11 मई को इंदौर में विराजित रहेंगे। वे देश के एकमात्र ऐसे तपस्वी संत हैं जो पिछले 2031 दिनों से केवल नर्मदा के जल पर आश्रित हैं। कथा 11 मई तक खजराना गणेश मंदिर परिसर स्थित दौलतराम छाबछरिया सत्संग भवन पर प्रतिदिन शाम 5 से 8 बजे तक हो रही है।
आचार्य रविकांत शास्त्री ने मनोहारी भजनों की रसधारा बहाते हुए कहा कि जिस तरह पत्थर और हीरे को तराशे बिना उनकी चमक और उनका स्वरुप नहीं निखरता उसी तरह सच्चे भक्त को भी अपने तप और त्याग से स्वयं को समर्पित करना पड़ेगा। माँ नर्मदा हम सबके लिए परमात्मा का ऐसा प्रसाद है, जिसने राष्ट्र और समाज को हमेशा दिया ही दिया है, लिया कुछ नहीं। हम माँ नर्मदा के कर्ज से कभी मुक्त नहीं हो सकते। माँ नर्मदा की लीलाओं में अपने भक्तों के प्रति कल्याण और उद्धार का ही भाव है। उनकी लीलाओं को समझना हमारे बस की बात नहीं है लेकिन इतना तय है कि माँ के स्वरुप में भगवती नर्मदा कभी किसी का अहित नहीं कर सकती। जितनी महत्ता अन्य नदियों की है, जितनी किवदंतियां और जितनी लीलाएँ अन्य नदियों की है, उनके मुकाबले माँ नर्मदा की हर बात अनूठी और निराली है। भक्त की कीमत तभी समझ आएगी जब वह भगवान के द्वार पर मत्था टेकेगा। संसार के सामने मांगने से कुछ नहीं मिलेगा पर माँ नर्मदा की पुण्याई इतनी है कि वह तो बिना मांगे ही बहुत कुछ बल्कि सबकुछ दे देती है।
संयोजक राजेंद्र बंसल एवं नित्यम बंसल ने बताया कि कथा में शनिवार 9 मई को माँ नर्मदा की परिक्रमा की महिमा, 10 को नर्मदा तट के तीर्थों का वर्णन और सोमवार 11 मई को तपोनिष्ठ संत अवधूत श्री दादागुरु भगवान के आशीर्वचन, दर्शन के पश्चात महाप्रसादी का आयोजन होगा। प.पू. दादागुरु भगवान रविवार 10 मई को भी कथा में पावन सानिध्य प्रदान करेंगे। प.पू. दादागुरु भगवान 10 मई को इंदौर पधारेंगे। वे 10 और 11 मई को नर्मदा चिंतन ज्ञान यज्ञ में पावन सानिध्य प्रदान करेंगे।
