खजराना गणेश मंदिर परिसर में सप्त ऋषि भागवत मंडल की मेजबानी में चल रहे भागवत ज्ञान यज्ञ का समापन, विद्वान वक्ता का सम्मान

इंदौर भगवान का कोई भी सखा कभी गरीब नहीं रह सकता। भक्ति और धर्म एकदूसरे के पूरक और पर्याय हैं। भक्ति और सेवा वही सार्थक होगी, जिसमें सबके कल्याण और भले का भाव हो। जिस भक्ति या सेवा में लोक कल्याण का भाव नहीं होता, वह प्रकल्प पाप कर्म की श्रेणी में माना जाता है। जीव मात्र के प्रति मन, वाचन और कर्म से दया, करुणा और स्नेह का मनोरथ ही हमें धर्म और नीति के रास्ते में मोक्ष की मंजिल तक पहुँचा सकता है। कृष्ण और सुदामा जैसी मित्रता का भाव आज के दौर में पूरे विश्व में होना चाहिए।
ये दिव्य विचार हैं भागवताचार्य पं. पुष्पानंदन पवन तिवारी के, जो उन्होंने सप्तऋषि भागवत मंडल के तत्वावधान में पुरुषोत्तम मास के उपलक्ष्य में गत 17 मई से खजराना गणेश मंदिर स्थित सत्संग सभागृह में चल रहे भागवत ज्ञान यज्ञ में कृष्ण सुदामा मैत्री एवं भागवत पूजन प्रसंग की व्याख्या के दौरान व्यक्त किए। कथा में कृष्ण सुदामा मैत्री का भावपूर्ण उत्सव भी धूमधाम से मनाया गया। मातृशक्ति ने नाचते-गाते हुए मित्रता के इस भावपूर्ण प्रसंग को आत्मसात किया। कथा शुभारम्भ के पूर्व मनोरथी समूह की ओर से अशोक-आरती खंडेलवाल, आशीष-खनक शर्मा, हितेंद्र-वन्दना ग्रोवर, एवं स्वप्न-स्वाति खंडेलवाल आदि ने व्यास पीठ का पूजन किया। विद्वान वक्ता की अगवानी महेंद्र-दिव्या मानधन्या, रामचंद्र-उषा पीतलिया एवं लक्ष्मण-चंद्रकांता कानूनगो ने की। इस अवसर पर आयोजन समिति की ओर से विद्वान और दुबई, सिंगापुर, मॉरीशस, श्रीलंका, नेपाल, मलेशिया, वियतनाम तथा देश के लगभग सभी तीर्थस्थलों पर सनातन धर्म एवं संस्कृति की ध्वजा फहराने वाले भागवताचार्य पं. तिवारी का आत्मीय और गरिमापूर्ण सम्मान भी किया गया। महापौर परिषद के सदस्य राजेंद्र राठोर, भाजपा नेता हरिनारायण यादव सहित अनेक पार्षद भी इस अवसर पर उपस्थति थे।
पं. तिवारी ने कहा कि मित्रों के प्रति हमारे मन में आत्मीयता और सम्मान का भाव होना चाहिए, लेकिन कलियुग में मित्रता को नए सिरे से परिभाषित करने की जरूरत है। कृष्ण जैसे राजा और सुदामा जैसी मित्र इस युग में दुर्लभ ही हैं लेकिन यह भी सच है कि भगवान का कोई भी सखा कभी गरीब नहीं रह सकता। कृष्ण और सुदामा की मैत्री राजा और प्रजा के मिलन की प्रतीक है। दुनिया के आधुनिक शासकों को भी इस मित्रता से सबक लेकर अपने आसपास के सुदमाओं के लिए अपने राजमहलों के दरवाजे खोल देना चाहिए। जिस दिन ऐसा होने लगेगा, हमारा प्रजातंत्र भी सार्थक हो उठेगा। कथा में तो हम सात दिन बैठ लिए, अब कथा को भी अपने अंदर बिठाने की जरूरत है।
