
दलाल बाग में चल रही चातुर्मास की धर्मसभा में राष्ट्रसंत प.पू. सुधासागर म.सा. के प्रेरक और ओजस्वी आशीर्वचन
इंदौर कर्म के सिद्धांत में सबसे महत्वपूर्ण बात उसके भाव होते हैं। कर्म बाद में दिखाई देता है किन्तु उसकी शुरुआत भीतर उठने वाली भावना से होती है। यदि मन में गलत भावना होगी तो आगे चलकर वह पाप कर्म का कारण बनेगी इसलिए केवल बाहरी आचरण को सुधारना पर्याप्त नहीं है, अपने भीतर उठने वाले भावों को देखना और उन्हें शुद्ध करना भी आवश्यक है। भावना शुद्ध होगी तो कर्म भी शुद्ध होंगे और कर्म शुद्ध होंगे तो जीवन की दिशा भी संवर जाएगी। भविष्य बदलने की शुरुआत हमें अपने भावों से करना चाहिए। केवल धर्म की बातें सुन लेना, भगवान से कुछ मांग लेना या पूजा-पाठ कर लेना ही पर्याप्त नहीं है। धर्म तभी सार्थक होगा जब हम उसे अपने जीवन में भी धारण करें।
संत शिरोमणि प.पू. विद्यासागर म.सा. के परम प्रभावक शिष्य और राष्ट्रसंत मुनि पुंगव प.पू. श्री सुधासागर महाराज ने सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में वीआईपी रोड स्थित किला मैदान, दलाल बाग परिसर में निर्मित विद्या-सुधा मंडप में चल रहे चातुर्मास महोत्सव की धर्मसभा में उक्त प्रेरक और ओजस्वी विचार व्यक्त किए। रविवार को गुजरात से एक हजार से अधिक श्रद्धालु दलाल बाग पहुंचे और अगला चातुर्मास गुजरात में करने के लिए राष्ट्रसंत को श्रीफल भेंट किया। प्रारम्भ में आयोजन समिति की ओर से चक्रवर्ती अध्यक्ष नवीन-शिवानी गोधा, सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद-अंतिका गोधा, महामंत्री हर्ष-तृप्ति जैन एवं आकाश-दीपिका जैन कोयला आदि ने देशभर से आए साधकों की अगवानी की। इस अवसर पर महोत्सव समिति के अध्यक्ष अशोक डोसी, विजय पाटौदी, प्रिंसपाल टोंग्या, अक्षय कासलीवाल, डॉ. शरद शास्त्री, सौरभ बडजात्या, विजय कासलीवाल, भूपेंद्र भोपाली एवं विजय जैन ने भी सभा की व्यवस्थाओं में सहयोग प्रदान किया। प्रचार प्रमुख संजय पाटोदी ने बताया कि दलाल बाग पर पर्यूषण महापर्व पर 15 सितम्बर से श्रावक संस्कार शिविर का आयोजन भी होगा जिसके लिए पंजीयन जारी हैं। दलाल बाग पर प्रतिदिन सुबह 8 से 9.30 बजे तक राष्ट्रसंत के प्रवचनों की अमृत वर्षा का क्रम जारी है।
राष्ट्रसंत प.पू. सुधासागर म.सा. ने कहा कि भगवान पर विश्वास करना अच्छी बात है लेकिन अपनी पूरी जिन्दगी सिर्फ भगवान के भरोसे छोड़ देना ठीक नहीं है। भगवान हमें रास्ता दिखाते हैं, आशीर्वाद देते हैं, प्रेरणा भी देते हैं लेकिन जीवन की गाड़ी चलाने की जिम्मेदारी स्वयं हमें ही निभाना होगी। तीन बातें जीवन में स्पष्ट होना चाहिए- जीवन की गाड़ी अपनी हो, उसकी दिशा का निर्णय हम स्वयं करें और ड्राईवर भी स्वयं बनें। मनुष्य का वास्तविक परिचय उसके जन्म, जाति या कुल से नहीं बल्कि उसके कर्म और चरित्र से होता है। हमारे कर्म इतने श्रेष्ठ होना चाहिए कि उनके कारण हमारे कुल और परिवार का नाम ऊँचा होता रहे।
केवल मंदिर जाना ही पर्याप्त नहीं है, मंदिर हमें भगवान के दर्शन के साथ-साथ अपने भीतर झाँकने की भी प्रेरणा देते हैं। यदि मंदिर जाकर भी हमारे कर्म और व्यवहार में बदलाव नहीं आता है तो हमें अपनी धार्मिकता पर विचार करना चाहिए। सच्ची भक्ति भगवान से अपनी कामनाओं की पूर्ति माँगना नहीं बल्कि भगवान के गुणों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करना है। जब हमारे अंदर लोभ, अहंकार, क्रोध और अपेक्षाएं कम होने लगती हैं तब हमारे अंदर वास्तविक शांति का जन्म होगा। भगवान पर श्रद्धा रखें लेकिन अपने कर्म, अपने निर्णय और अपने पुरुषार्थ की जिम्मेदारी स्वयं उठाएं। भगवान को जीवन की गाड़ी का ड्राईवर नहीं, उन्हें अपना मार्गदर्शक बनाएं।
