हमें ढोंग का नहीं, ढंग का जीवन जीने का पुरुषार्थ करना चाहिए – पं. प्रभुजी नागर
इंदौर, । आज हमारे चारों ओर ढोंग ही ढोंग पसरा हुआ है। धर्म में भी ढोंग का चलन बढ़ गया है। हमें ढोंग का नहीं, ढंग का जीवन जीने का पुरुषार्थ करना चाहिए। इस ढोंग भरे माहौल से बाहर निकलकर जीवन में एक ऐसा पवित्र संकल्प करें या किसी ऐसे काम का बीड़ा उठाएं कि वह हमारे जीवन की साधना और तपस्या बन जाए। हम भले ही मन्दिर न जाएँ, पूजा-पाठ, तीर्थ यात्रा, गंगा स्नान और अन्य कोई कार्य न करें लेकिन यदि जटायु की तरह केवल सीता जी की रक्षा करने जैसा कोई शुभ संकल्प ही धारण कर लें तो हमें भी अपने राम का सानिध्य मिल सकता है। जीवन में कोई न कोई अच्छे काम का बीड़ा जरुर उठाना चाहिए। जीवन की सार्थकता यही है कि हम अच्छा बोलें, अच्छा सुनें, अच्छा देखें और अच्छा सोचें। सनातन धर्म की मजबूती और समाज में संस्कारों की समृद्धि के लिए हमें दर्शनार्थी नहीं सेवादार बनकर काम करना चाहिए। भागवत कथा की सार्थकता यही है कि हम अपने जीवन को श्रेष्ठ विचारों और संकल्पों से इतना ऊँचा बनाएं कि भगवान खुद हमें अपनी गोद में बिठा लें।
मालव माटी के सपूत, माँ सरस्वती के वरद पुत्र और प्रदेश में 200 से अधिक गौशालाओं के संचालक संत कमलकिशोर नागर के सुपुत्र तथा प्रख्यात भागवत मर्मज्ञ संत प्रभुजी नागर ने बुधवार को अन्नपूर्णा मंदिर परिसर में गत 6 नवंबर से चल रहे भागवत ज्ञान यज्ञ के समापन प्रसंग पर उपस्थित भक्तों के सैलाब को आशीर्वचन देते हुए उक्त प्रेरक विचार व्यक्त किए। पं. प्रभुजी नागर ने भगवान की विविध लीलाओं की व्याख्या प्रस्तुत करते हुए अनेक ऐसे प्रसंग और भजन सुनाए कि 20 हजार से अधिक भक्तों से भरा कथा पंडाल बार-बार कभी जयघोष करने में डूबा रहा तो कभी भजनों पर थिरकने में। कथा श्रवण करने के लिए आए अन्नपूर्णा आश्रम के महामंडलेश्वर स्वामी विश्वेश्वरानंद गिरि, स्वामी जयेंद्रानंद गिरि, ओंकारेश्वर अन्नपूर्णा मंदिर के स्वामी सच्चिदानंद गिरि, भागवताचार्य पं. पवन तिवारी, नरसिंह मंदिर के स्वामी वरदानंद एवं स्वामीनारायण मंदिर के संतों सहित अनेक संतों की अगवानी मुख्य यजमान सुरेश-अनिता अग्रवाल के साथ पूर्व सांसद कृष्णमुरारी मोघे, विधायक मालिनी गौड़, पार्षद अभिषेक बबलू शर्मा, समाजसेवी रामबाबू–श्यामबाबू अग्रवाल, सुखदेव पाटीदार, राजेश अग्रवाल, दिनेश बंसल, हेमंत गर्ग, राधेमोहन अग्रवाल (कोटा), गोविंद अग्रवाल (बैंगलोर) आदि ने की। कथा समापन प्रसंग पर यज्ञ-हवन का अनुष्ठान भी संपन्न हुआ, जिसमें हजारों भक्तों ने आहुतियाँ समर्पित कर परिवार, समाज और राष्ट्र में सुख, शांति एवं सद्भाव की प्रार्थना की। समापन बेला में मुख्य यजमान सुरेश अग्रवाल ने भाव विभोर होकर उन सभी लोगों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जिन्होंने इस कथा को दिव्य और एतिहासिक बनाने में हरसंभव योगदान दिया है।
पं. नागर ने कहा कि ज्ञान और स्वाभिमान सीमित मात्रा में ही होना चाहिए। ज्यादा ज्ञान भी काम का नहीं होता और अल्पज्ञान भी खतरनाक होता है। मुर्ख के सामने मौन रहना ही समझदारी होती है। स्वाभिमान भी ऐसा होना चाहिए कि यदि कहीं कथा भागवत का आयोजन हो तो निमंत्रण की प्रतीक्षा नहीं करना चाहिए। दुश्मन के घर भी कथा हो रही हो तो एक दिन जरुर जाना। बहुत ज्यादा स्वाभिमान भी व्यक्ति को खाली बना देता है। अपनी हार को स्वीकार करना और अपनी गलतियों को मान लेना भी अच्छा होता है। भागवत में अनेक ऐसे सन्देश हैं जो हमारी गृहस्थी को हर मौके पर व्यवस्थित बनाने के लिए पर्याप्त माने गए हैं। अति जहाँ होती है, वहां इति हो जाती है।
महिलाओं को एकादशी, अमावस्या, पूर्णिमा जैसे त्योहारों पर भोजन के उपवास के साथ उस दिन मौन व्रत का भी पालन करना चाहिए। मुर्ख को ज्ञान देना भी अज्ञानता है। भैंस के आगे बीन बजाने का कोई फायदा नहीं। ज्ञान भी उनपर असर करता है जो जिज्ञासु हैं। इलाज उसका कारगर होता है जो खुद को बीमार मानता हो। ज्ञान का अजीर्ण खतरनाक होता है। जीवन को यदि सार्थक बनाना है तो यह मंत्र हमेशा याद रखें कि सुबह उठते ही भगवान के नाम का स्मरण करें और रात्रि में बिस्तर पर जाएँ तब भी प्रभु नाम को जरुर याद रखें। हम दिन में 16 घंटे काम करते हैं। यदि हमारा यह मंत्र रोज चलेगा तो प्रत्येक कर्म भगवान की पूजा बन जाएगा। जिस तरह सीए अर्थात चार्टेड एकाउंटेंट दो नंबर के कारोबार को एक नंबर में बना देते हैं, वैसे ही यह मंत्र भी हमारे दो नंबर के कामों को एक नंबर में बदल सकता है। जीवन में यही संकल्प लेकर चलें कि हम अच्छा काम करें, अच्छा चिंतन करें, अच्छा भोजन करें, अच्छा भजन करें और जहाँ तक हो सके अपनी नियति और नियत को हमेशा प्रभु से जोड़कर रखें।
सुदामा प्रसंग की व्याख्या करते हुए – पं. नागर ने कहा कि सुदामा एक जितेन्द्रीय और तपोनिष्ठ ब्राह्मण था। उसके पास खाने के लिए भोजन और पहनने के लिए वस्त्र भी नहीं थे लेकिन वह जब अपने साथ तीन मुट्ठी चावल लेकर अपने बाल सखा श्रीकृष्ण के पास पहुंचा तो उसे बदले में त्रिलोकी का राज मिल गया। सुदामा की तरह हमारी मुट्ठी भी हमेशा सेवा कार्यों के लिए खुली होना चाहिए, तभी श्रीकृष्ण सुदामा की तरह हमारे लिए भी अपने महल के द्वार खोलकर रखेंगे। जीवन में शुभ संकल्पों की श्रृंखला कभी खत्म नहीं होना चाहिए। जैसे-जैसे हमारे संकल्प पूरे होते जाएँगे, हमारे राम और कृष्ण भी हमें हर छोटी-बड़ी तकलीफों से सचेत कर हमारी मदद के लिए दौड़े चले आएँगे। भक्ति की ताकत सबसे बड़ी मानी गई है। भागवत भक्ति के सृजन और मंथन का ही सदग्रंथ है, जिसे सुनने की प्यास कभी तृप्त नहीं होती। यह अतृप्ति ही हमारी भक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण है।


