प्रभु राम भारत भूमि का चरित्र, शील, संयम, सदाचार और नैतिकता हैं – पं श्रीराम प्रपन्नाचार्य
हवा बंगला स्थित हरिधाम आश्रम पर हनुमत महायज्ञ में 11 लाख के लक्ष्य के मुकाबले सम्पन्न हुई 12 लाख 80 हजार आहुतियाँ
अधिकमास के उपलक्ष्य में चल रहे अनुष्ठानों की पूर्णाहुति – 25 गांवों के भक्तों के लिए हुआ भंडारा

इंदौर प्रभु राम धर्म, मर्यादा और संस्कृति की शाश्वत मूर्ति हैं। जग में सुंदर हैं दो नाम, चाहे कृष्ण कहो या राम। प्रभु राम भारत भूमि का चरित्र, शील, संयम, सदाचार, और नैतिकता हैं तो कृष्ण माधुर्य, दर्शन और मनीषी के प्रतिरूप हैं। धर्म से आनंद, वैभव और शांति की प्राप्ति होती है। धर्म वह नौका है जो हमें स्वर्ग लेकर जाएगी। धर्म एक छवि है, धर्म एक आकार है, धर्म संवेदना है। चारों भाइयों के बीच समर्पण, त्याग और अपनत्व के उदाहरण बेमिसाल हैं। दुनिया के किसी अन्य ग्रन्थ और कथा में इस तरह के प्रेरक प्रसंग नहीं हैं। इसीलिए राम हर युग में वन्दनीय हैं।
श्रीधाम वृन्दावन के प्रख्यात कथाकार पं. श्रीराम प्रपन्नाचार्य महाराज ने शुक्रवार को हवा बंगला, कैट रोड स्थित हरिधाम आश्रम पर अधिकमास के उपलक्ष्य में गत 22 मई से चल रहे हनुमत महायज्ञ एवं 23 मई से चल रही सात दिवसीय राम कथा के समापन अवसर पर विभिन्न प्रसंगों की भावपूर्ण व्याख्या के दौरान उक्त दिव्य विचार व्यक्त किए। कथा में वृन्दावन से आए भजन गायकों एवं संगीतज्ञों की प्रस्तुतियों ने आज भी भक्तों को मंत्रमुग्ध बनाकर थिरकाए रखा। कथा शुभारंभ के पूर्व आश्रम के अधिष्ठाता महंत शुकदेवदास महाराज के सानिध्य में समाजसेवी विष्णु बिंदल, टीकमचंद गर्ग, दिनेश मित्तल, गोपाल गोयल, डॉ. सुरेश चोपड़ा, ललित अग्रवाल, सुधीर अग्रवाल, मुकेश जैन, विजय सिंह राणा, ओमप्रकाश अग्रवाल, संतोष कुमार सिंह आदि ने व्यास पीठ का पूजन किया।
विद्वान वक्ता ने कहा कि यदि धर्म के मार्ग पर चलकर हम अपने राम का नियमित स्मरण करते रहें तो यह भी धर्म-आचरण माना जाएगा। राम को यह दिव्यता प्रदान करने में छोटे भाई भरत सही सभी भाइयों का त्याग और समर्पण रहा है। भरत और राम के बीच स्नेह और विश्वास के सूत्र इतने मजबूत हैं कि हर भाई कि यही इच्छा होती है कि छोटा भाई हो तो भरत जैसा और बड़ा हो तो राम जैसा। पुत्र हो तो राम जैसा और पति हो तो राम जैसा। दूसरी ओर आज भी भारतीय परिवारों में कैकेयी, शूर्पणखा और मंथरा जैसे नाम नहीं रखे जाते। इन तीनों ने अपने कर्मों से अपने नामों को लांछित बना डाला। इनके नाम इतिहास में जरुर हैं लेकिन लोगों की नजरों से उतरे हुए हैं। राम कथा की सार्थकता यही है कि हम राम के आदर्शों और मर्यादा पुरुषोत्तम के संस्कारों को घर-घर और नगर-नगर तक पहुंचाएं।
हनुमत महायज्ञ की पूर्णाहुति – आश्रम पर महंत शुकदेवदास महाराज के सानिध्य एवं यज्ञाचार्य पं. ललित पाठक के निर्देशन में 51 विद्वानों द्वारा प्रतिदिन सुबह 8 से दोपहर 1.30 बजे तक आश्रम परिसर में निर्मित यज्ञशाला में चल रहे हनुमत महायज्ञ की पूर्णाहुति सौल्लास सम्पन्न हुई। समाजसेवी विष्णु बिंदल, टीकमचंद गर्ग, दिनेश मित्तल, गोपाल गोयल, डॉ. सुरेश चोपड़ा, ललित अग्रवाल, सुधीर अग्रवाल, मुकेश जैन, विजय सिंह राणा, ओमप्रकाश अग्रवाल, संतोष कुमार सिंह के आतिथ्य में जैसे ही दोपहर में 12 लाख 80 हजारवीं आहुति डाली गई, समूची यज्ञशाला एवं हरिधाम परिसर यज्ञनारायण के जयघोष से गूंज उठे। प्रभु श्रीराम एवं हनुमानजी के जयघोष से हरिधाम क्षेत्र गुंजायमान बना रहा।
यज्ञ में प्रतिदिन “कवन सो काज कठिन जग माही, जो नहीं होइ तात तुम पाहीं” महामंत्र से 1 लाख 60 हजार आहुतियाँ समर्पित की गई और आज 8वें दिन जैसे ही 12 लाख 80 हजार आहुतियाँ सम्पन्न हुई तो बड़ी संख्या में मौजूद श्रद्धालुओं ने यज्ञ नारायण की पूजा अर्चना एवं यज्ञ शाला की परिक्रमा प्रारम्भ कर दी। इस तरह इस महायज्ञ में 11 लाख लक्ष्य के मुकाबले 12 लाख 80 हजार आहुतियाँ सम्पन्न हुई। यज्ञ शाला की परिक्रमा करने वालों में आज भी अनेक बीमार, दिव्यांग, दृष्टिहीन लोग भी शामिल हुए। स्वदेशी जागरण मंच के कार्यकर्ताओं ने पूरे समय महायज्ञ एवं राम कथा की व्यवस्थाएं सँभालने में सहयोग किया। पूर्णाहुति के अवसर पर यज्ञाचार्य पं. ललित पाठक, कथाकार पं. श्रीराम प्रपन्नाचार्य एवं अन्य सहयोगी विद्वानों का सम्मान भी किया गया। पूर्णाहुति पर शहरी क्षेत्र के अलावा 25 गांवों के 10 हजार से अधिक भक्तों ने महाप्रसादी का पुण्यलाभ उठाया।
