खजराना गणेश मन्दिर पर चल रहे नर्मदा चिंतन ज्ञान यज्ञ में हुआ माँ नर्मदा के प्राकट्य का प्रभावी वर्णन – दादागुरु भगवान आएंगे

इंदौर दुनिया के तमाम देश प्रदर्शन में डूबे हुए हैं लेकिन हमारे भारत की यही खूबी है कि हम प्रदर्शन नहीं, दर्शन में विश्वास रखते हैं। भारत ही दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहाँ हम नदियों को माँ का दर्जा और सम्मान देते हैं। माँ कभी भी अपने बेटों की अनसुनी और अनदेखी नहीं कर सकती। माँ ऐसा विश्व विद्यालय है जहाँ हम बचपन से लेकर अंतिम क्षणों तक बिना किताबों के भी जीवन के व्यवहारिक सूत्रों, जैसे बोलना, चलना, खाना और अन्य क्रियाएँ सीख जाते हैं। जो परिपूर्णता हमें माँ से मिलती है, वह दुनिया की और कोई शक्ति नहीं दे सकती। नर्मदा केवल हमारा नहीं लाखों-करोड़ों जीवों, पेड़-पौधों और प्रकृति का भी लालन-पालन कर रही है। भारत का सनातन धर्म नर्मदा जैसी जीवनदायी माँ के कारण ही अक्षुण्य बना हुआ है और आगे भी बना रहेगा।
ये प्रेरक, ओजस्वी और प्रभावी विचार हैं नर्मदा परिक्रमावासी आचार्य पं. रविकांत शास्त्री के, जो उन्होंने खजराना गणेश मन्दिर स्थित सत्संग सभागृह पर अ.भा. दादा गुरु परिवार इंदौर नर्मदा मिशन की मेजबानी में चल रहे नर्मदा चिंतन ज्ञान यज्ञ में गुरुवार को माँ भगवती नर्मदा के प्राकट्य उत्सव की व्याख्या के दौरान व्यक्त किए। कथा शुभारंभ के पूर्व समाजसेवी राजेंद्र बंसल, नित्यम बंसल, सुमित अग्रवाल, राजकुमार बंसल, देवांग शर्मा, राम सोलंकी, अनिल अग्रवाल, मारुती माने, सचिन माने, मुकेश खंडेलवाल, स्वप्निल माने आदि ने व्यास पीठ एवं नर्मदा पुराण ग्रन्थ का पूजन किया। भाजपा के जिलाध्यक्ष श्रवण सिंह चावड़ा ने भी कथा श्रवण का पुण्यलाभ उठाया। मातृशक्ति की ओर से ज्योति बंसल, प्रेरणा बंसल सहित सैकड़ों महिलाओं ने परिक्रमावासी आचार्य पं. रविकांत शास्त्री की अगवानी की। कथा श्रवण के लिए बड़ी संख्या में नर्मदा भक्त, परिक्रमावासी और नर्मदा तट स्थित धर्मस्थलों के संत-महंत भी आ रहे हैं। देश के तपोनिष्ठ संत दादागुरु भी इस पावन कथा को सानिध्य प्रदान करने 9 से 11 मई तक इंदौर में विराजित रहेंगे। वे देश के एकमात्र ऐसे तपस्वी संत हैं जो पिछले 2030 दिनों से केवल नर्मदा के जल पर आश्रित हैं। कथा 11 मई तक खजराना गणेश मंदिर परिसर स्थित दौलतराम छाबछरिया सत्संग भवन पर प्रतिदिन शाम 5 से 8 बजे तक हो रही है।
आचार्य रविकांत शास्त्री ने कहा कि माँ नर्मदा को पापनाशिनी कहा गया है। यह मान्यता है कि माँ नर्मदा का प्राकट्य भगवान शिव की तपस्या से ही मेकल पर्वत पर हुआ। अमरकंटक से निकली माँ नर्मदा की कुल लम्बाई करीब डेढ़ हजार किमी है। यह एकमात्र नदी है जो पश्चिम की ओर बहती है। मप्र, महाराष्ट्र और गुजरात से होकर अरब सागर में मिलने वाली नर्मदा के तट पर दोनों और घने जंगल, पहाड़, घाट और अनेक धर्म स्थल मौजूद हैं। नर्मदा की सम्पूर्ण परिक्रमा करीब 3 वर्ष, 3 माह और 13 दिन में पूरी होती है। नर्मदा जीवन का प्रतीक है। आज दुनिया के सारे देशों की नजर हमारी ओर लगी हुई है कि इस भारत देश में ऐसा क्या है कि यहाँ सनातन संस्कृति कभी खत्म नहीं होती। ऐसे लोगों को समझ लेना चाहिए कि माँ नर्मदा के तट पर कुछ भी दुर्लभ और असम्भव नहीं है। जहाँ माँ है वहां बेटों की हर आवाज जरुर सुनी जाएगी। माँ से मिलने के लिए पिता बनकर नहीं, पुत्र बनकर जाना पड़ेगा। नर्मदा की परिक्रमा करने वाले लोग यदि सच्ची श्रद्धा से जाएं तो उन्हें कभी कष्ट नहीं होता, न ही कोई परिक्रमावासी भूखा या प्यासा रहता है। माँ नर्मदा के सम्पर्क में आने पर जब छोटा से छोटा कंकर भी शंकर बन सकता है तो फिर हम तो मनुष्य हैं। निश्चित ही माँ नर्मदा के सम्पर्क में आने पर हमारा उद्धार भी होगा ही।
संयोजक राजेंद्र बंसल एवं नित्यम बंसल ने बताया कि कथा में शुक्रवार 8 मई को माँ नर्मदा की लीलाओं का वर्णन, 9 को माँ नर्मदा की परिक्रमा की महिमा, 10 को नर्मदा तट के तीर्थों का वर्णन और सोमवार 11 मई को तपोनिष्ठ संत अवधूत श्री दादागुरु भगवान के आशीर्वचन, दर्शन के पश्चात महाप्रसादी का आयोजन होगा। प.पू. दादागुरु भगवान रविवार 10 मई को भी कथा में पावन सानिध्य प्रदान करेंगे। प.पू. दादागुरु भगवान 9 मई को इंदौर पधारेंगे।
