दलाल बाग पर चल रहे चातुर्मास अनुष्ठान की महती धर्मसभा में राष्ट्रसंत के प्रेरक आशीर्वचन – 15 से श्रावक संस्कार शिविर

इंदौर भगवान और गुरु के भक्तों को भोजन कराना सेवा, वात्सल्य और पुण्यार्जन का अवसर है। इसे शुल्क लेकर चलाने वाली व्यवस्था नहीं बनाना चाहिए। जब कोई भक्त धार्मिक आयोजन में आता है तो वह हमारे लिए किसी ग्राहक के रूप में नहीं बल्कि भगवान के भक्त और हमारे अतिथि के रूप में आता है। अतिथि से भोजन शुल्क लेना हमारी आतिथ्य परम्परा के भाव को कमजोर करता है लेकिन भोजन करने वालों को भी समझना चाहिए कि वे भोजन को अपना अधिकार समझकर बिलकुल निशुल्क ग्रहण करने की मानसिकता के बजाय अपनी सामर्थ्य के अनुसार भोजन के बाद दान भी करें और यदि किसी धार्मिक आयोजन में प्रेम और श्रद्धा के साथ भोजन की व्यवस्था की है तो उनका मान-सम्मान भी करना चाहिए।
संत शिरोमणि प.पू. विद्यासागर म.सा. के परम प्रभावक शिष्य और राष्ट्रसंत मुनि पुंगव प.पू. श्री सुधासागर महाराज ने शनिवार को सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में दलाल बाग के विशाल विद्या-सुधा सत्संग मंडप में चल रहे चातुर्मास के दौरान अपने आशीर्वचन में भोजन व्यवस्था को लेकर ऊक्त अत्यंत महत्वपूर्ण और विचारणीय सन्देश दिया। प्रारम्भ में चातुर्मास आयोजन समिति के शिवानी-नवीन गोधा, तृप्ति-हर्ष जैन, सपना-मनीष गोधा, अंतिका-आनंद गोधा एवं दीपिका-आकाश जैन कोयला ने सभी साधकों की अगवानी की। पर्यूषण महापर्व पर 15 सितम्बर से श्रावक संस्कार शिविर का आयोजन भी होगा जिसके लिए पंजीयन प्रारम्भ हो गए हैं। दलाल बाग पर प्रतिदिन सुबह 8 से 9.30 बजे तक राष्ट्रसंत की अमृत वर्षा का क्रम जारी है।
महाराजश्री ने अनेक उदाहरणों के माध्यम से समझाया कि धार्मिक आयोजनों की भोजन के नाम पर कोई शुल्क निर्धारित करना उचित नहीं है। चातुर्मास, पंचकल्याणक, महावीर जयंती अथवा अन्य किसी भी धार्मिक आयोजन में होने वाली भोजन व्यवस्था केवल भोजन नहीं, बल्कि सेवा और पुण्य का माध्यम है। भगवान और गुरु के भक्तों को भोजन कराना सेवा, वात्सल्य और पुण्यार्जन का अवसर है। यदि भगवान मेरा है तो भगवान के भक्त भी मेरे ही हैं- यह भाव होना चाहिए। किसी भक्त को हम ग्राहक के रूप में नहीं बल्कि अपने अतिथि के रूप में देखेंगे तो यह ज्यादा सार्थक होगा। शुल्क लेने से भोजन व्यापार जैसा दिखाई देता है जबकि स्वेच्छा से दिया गया दान सेवा और धर्म भावना को आगे बढाता है। राष्ट्रसंत ने अपनी भावना को स्पष्ट करते हुए कहा कि न भोजन बेचें, और न ही भोजन को मुफ्त का अधिकार समझें। भोजन को सेवा मानें और दान को अपना धर्म। भगवान के भक्त हमारे अतिथि हैं, उनसे शुल्क नहीं, उन्हें सम्मान चाहिए।
