गीता भवन के संस्थापक बाबा बालमुकुंद की पुण्यतिथि पर रामकृष्ण मठ भोपाल के सचिव नित्यज्ञानानंद महाराज का व्याख्यान

इंदौर गृहस्थ धर्म सनातन संस्कृति का सर्वश्रेष्ठ धर्म माना गया है। गीता में भगवान ने युद्ध के मैदान में अर्जुन को निमित्त बनाकर गृहस्थों के लिए जो सन्देश दिए हैं वे हर युग में शाश्वत और प्रासंगिक हैं। भगवान ने महाभारत के मैदान में तनावग्रस्त अर्जुन को अपने संदेशों से न केवल विषाद से मुक्त बनाया बल्कि उसे युद्ध लड़ने के लिए भी राजी किया। गीता गृहस्थों के विषाद को प्रसाद में बदलती है। यही कारण है कि गीता आज भी हम सबका मार्गदर्शन करने वाला एकमात्र ग्रन्थ है। यदि हमें गृहस्थ धर्म को बचाकर अपने कर्तव्यों और दायित्वों का निर्वहन करना है तो गीता जैसे धर्म ग्रन्थ का आश्रय लेना ही होगा।
ये प्रेरक विचार हैं रामकृष्ण मिशन भोपाल के सचिव स्वामी नित्यज्ञानानंद महाराज के, जो उन्होंने सोमवार को सुबह गीता भवन के संस्थापक बाबा बालमुकुन्द की 44वीं जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित विशेष प्रवचन के दौरान मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किए। रामकृष्ण मिशन इंदौर के सचिव स्वामी निर्विकरानंद की अध्यक्षता में आयोजित इस कार्यक्रम में बाबा बालमुकुन्द के सैकड़ों स्नेहीजनों, परिजनों एवं गीता भवन के भक्तों ने उन्हें पुष्पांजलि समर्पित की। इसके लिए गीता भवन के पीछे स्थित बाबा बालमुकुन्द की समाधि को विशेष रूप से पुष्पों से श्रृंगारित किया गया था जहाँ सभी संतों एवं अतिथियों ने कतारबद्ध होकर उन्हें पुष्पांजलि समर्पित की।
इसके पूर्व गीता भवन सत्संग भवन में आयोजित कार्यक्रम में ट्रस्ट के अध्यक्ष राम ऐरन, मंत्री रामविलास राठी, मनोहर बाहेती, प्रेमचंद गोयल, दिनेश मित्तल, बाबा बालमुकुंद के पोते संजीव कोहली, महेशचंद्र शास्त्री, पवन सिंघानिया, टीकमचंद गर्ग, हरीश माहेश्वरी आदि ने सभी संतों और मेहमानों का स्वागत किया। ट्रस्ट के अध्यक्ष राम एरन ने बाबा बालमुकुन्द के जीवन चरित्र पर प्रकाश डाला और ट्रस्ट की गतिविधियों का विवरण दिया। अध्यक्षीय उद्बोधन में स्वामी निर्विकरानंद ने भी गीता भवन और बाबा बालमुकुन्द के सेवा कार्यों की खुलेमन से सराहना की। कार्यक्रम का संचालन महेश चन्द्र शास्त्री ने किया और आभार माना मंत्री रामविलास राठी ने।
