
दलाल बाग पर सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में चल रही चातुर्मासिक धर्मसभा में राष्ट्रसंत के आशीर्वचन
इंदौर, ज्ञान का उद्देश्य केवल नौकरी और आजीविका प्राप्त करना नहीं बल्कि अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाना, आत्म कल्याण करना और अपने ज्ञान से समाज एवं राष्ट्र की सेवा करना भी है। मनुष्य को जीवन में धन, पद और प्रतिष्ठा प्राप्त करने के साथ-साथ ज्ञान, संस्कार और गुरु के उपकार को भी सदैव याद रखना चाहिए। धन और लक्ष्मी के पीछे भागते हुए सरस्वती अर्थात ज्ञान को कभी नहीं भूलें। जीवन में प्रत्येक व्यक्ति को अपने सामर्थ्य के अनुसार धर्म, समाज और देश की सेवा के लिए भी अवश्य समय निकालना चाहिए। ज्ञान केवल धनार्जन करने का साधन नहीं बने बल्कि आत्म विकास, सदाचार और आत्म कल्याण का माध्यम भी बनना चाहिए।
ये दिव्य और प्रेरक विचार हैं संत शिरोमणि प.पू. विद्यासागर म.सा. के परम प्रभावक शिष्य और राष्ट्रसंत मुनि पुंगव प.पू. श्री सुधासागर महाराज के, जो उन्होंने रविवार को सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में वीआईपी रोड स्थित किला मैदान, दलाल बाग परिसर में निर्मित विद्या-सुधा मंडप में चल रहे चातुर्मास महोत्सव में आयोजित नियमित धर्मसभा में संबोधित करते हुए व्यक्त किए। धर्मसभा का शुभारंभ मंगलाचरण एवं पाद प्रक्षालन के साथ हुआ। धर्मसभा में देशभर से आए साधकों की अगवानी महोत्सव के चक्रवती अध्यक्ष नवीन गोधा, सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद गोधा, चक्रवर्ती मनीष गोधा, महोत्सव समिति के अध्यक्ष अशोक डोसी, महामंत्री हर्ष जैन, विजय पाटोदी, मुकेश पाटोदी, संजय सामरिया, आकाश जैन कोयला, प्रिंसपाल टोंग्या, संजय पाटोदी, सौरभ बडजात्या, राहुल सेठी, भूपेंद्र भोपाली एवं आशीष जैन सहित अनेक सहयोगी बंधुओं ने की। राष्ट्रसंत के प्रवचन नियमित रूप से प्रतिदिन सुबह 8 से 9.30 तक धर्मसभा में जारी हैं।
राष्ट्रसंत ने अपने प्रवचन में कहा कि किसी भी शैक्षणिक एवं धार्मिक संस्थान की सबसे बड़ी उपलब्धि तब होती है, जब वहां अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों के मन में संयम, त्याग और साधना के मार्ग पर आगे बढने की भावना जागृत होती है। गुरु के प्रति श्रद्धा, विनम्रता और समर्पण का महत्व बताते हुए राष्ट्रसंत ने कहा कि सच्चा शिष्य वही है जो गुरु की शिक्षाओं को अपने जीवन में उतारता है और सफलता प्राप्त करने के बाद भी अपने गुरु एवं संस्थान के उपकार को नहीं भूलता। राष्ट्रसंत ने उपस्थित धर्मालुओं से आग्रह किया कि वे धर्मसभा में अमृत वाणी का श्रवण कर ज्ञान, धर्म, संयम और गुरु भक्ति के सन्देश को अपने जीवन में आत्मसात करे।
