दलाल बाग पर सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में चल रही चातुर्मासिक धर्मसभा में आशीर्वचन

इंदौर, सच्चा मित्र वही है जो हमारे दोषों को पहचानकर हमें उन्हें दूर करने की प्रेरणा देता है। मित्रता का धर्म केवल साथ निभाना नहीं बल्कि गलत मार्ग पर जाने से रोकना भी है। याद रखें कि हर विरोध करने वाला व्यक्ति शत्रु नहीं होता और हर प्रशंसा करने वाला व्यक्ति सच्चा मित्र नहीं होता। जीवन में ऐसे मित्र और गुरु का सानिध्य प्राप्त करना चाहिए जो हमारे दोषों को दूर कर सदगुणों को विकसित करने और आत्म कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा दें। भक्ति का वास्तविक उद्देश्य भगवान के गुणों को समझकर उनके माध्यम से अपने जीवन को निर्मल और निश्छल बनाने का होना चाहिए।
ये दिव्य और प्रेरक विचार हैं राष्ट्रसंत मुनि पुंगव प.पू. श्री सुधासागर महाराज के परम शिष्य एलक श्रीसुनय सागर म.सा. के, जो उन्होंने मंगलवार को सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में वीआईपी रोड स्थित किला मैदान, दलाल बाग परिसर में निर्मित विद्या-सुधा मंडप में चल रहे चातुर्मास महोत्सव में आयोजित नियमित धर्मसभा में संबोधित करते हुए व्यक्त किए। धर्मसभा में देशभर से आए साधकों की अगवानी महोत्सव के चक्रवती अध्यक्ष नवीन गोधा, सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद गोधा, चक्रवर्ती मनीष गोधा, महोत्सव समिति के अध्यक्ष अशोक डोसी, महामंत्री हर्ष जैन, आकाश जैन कोयला, प्रिंसपाल टोंग्या, संजय पाटोदी, सौरभ बडजात्या, राहुल सेठी, भूपेंद्र भोपाली एवं आशीष जैन सहित अनेक सहयोगी बंधुओं ने की। धर्मसभा नियमित रूप से प्रतिदिन सुबह 8 से 9.30 तक होगी।
एलक श्रीसुनय सागर म.सा. ने अपने प्रवचन में कहा कि माता-पिता बच्चों के जीवन में संस्कारों का रोपण करते हैं जबकि गुरु उन्हें अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाते हैं। शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करना या किसी व्यवसाय में विशेषज्ञ बनना ही नहीं बल्कि एक संस्कारी, विवेकशील और जिम्मेदार इन्सान बनना भी है। जिन शासन के विभिन्न विद्वानों के धर्म ग्रंथों और जैन दर्शन की विशेषताएँ बताते हुए एलक श्रीसुनय सागर म.सा. ने कहा कि जिनेन्द्र भगवान की भक्ति का उद्देश्य केवल सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति करना नहीं बल्कि उनके वीतरागता, ज्ञान और आत्मशुद्धि जैसे गुणों को अपने जीवन में धारण करना है। भगवान की वन्दना उनके गुणों की प्राप्ति के उद्देश्य से की जाना चाहिए। सच्चे गुरु की महानता इसी में है कि वे अपने शिष्यों को ज्ञानवान बनाए, उनके गुणों को विकसित करें और उन्हें आत्म कल्याण के लिए प्रेरित करें।
