देश-विदेश से आए 10 हजार श्रावकों की मौजूदगी में राष्ट्रसंत सुधासागर म.सा. के पावन सानिध्य में प्रारम्भ हुआ 33वां श्रावक संस्कार शिविर

इंदौर दिगम्बर जैन समाज के दस दिवसीय पर्युषण महापर्व का शुभारंभ बुधवार को सुबह वीआईपी रोड, दलाल बाग स्थित विशाल विद्या-सुधा मंडप में देश-विदेश से आए हजारों श्रावकों की मौजूदगी में संत शिरोमणि प.पू. विद्यासागर म.सा. के परम प्रभावक शिष्य और राष्ट्रसंत मुनि पुंगव प.पू. श्री सुधासागर महाराज के पवन सानिध्य में भक्ति, उत्साह, जोश, अनुशासन और अध्यात्म की ऊर्जा के अनुपम परिदृश्य से सराबोर माहौल में हुआ। सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में यह 33वां श्रावक संस्कार शिविर है जो पूरे दस दिनों तक चलेगा। इस दौरान शिविर में शामिल सभी आयु वर्ग के श्रावक यहाँ रहते हुए अपने गाड़ी, बंगले, नौकर-चाकर, मोबाइल, टीवी सहित सभी सांसारिक वैभव को छोड़कर मुनियों जैसी दिनचर्या बिताएंगे। शहर के हजारों परिवारों ने अतिथि देवो भवः की परम्परा के अनुरूप इन्हें अपना मेहमान बनाने का संकल्प लिया है। शहर में जैन समाज के इतिहास में यह पहला ऐसा अनुष्ठान है जिसमें शामिल श्रावक-श्राविकाएं शिविर में ही रहकर जप-तप एवं त्याग-साधना में लीन रहेंगे।
दलाल बाग स्थित विशाल मंडप में आज सुबह से ही श्रावकों के आगमन का सिलसिला शुरू हो गया था। सफ़ेद धोती एवं दुपट्टा पहने श्रावक सुबह 6 बजे से ही पंडाल में पहुँचने लगे थे। अनेक श्रावकों ने अपने केशलोच भी किए। शिविर के प्रमुख पुण्यार्जक चक्रवर्ती आकाश-आलोक जैन कोयला एवं चातुर्मास के चक्रवर्ती मनीष-सपना गोधा, नवीन-शिवानी गोधा, आनंद-अंतिका गोधा एवं सकल दिगंबर जैन धर्म प्रभावना समिति के महामंत्री हर्ष जैन ने बताया कि शिविर में आने वाले सभी साधकों ने पहले णमोकार मन्त्र का सामूहिक जाप किया। राष्ट्र संत सुधासागर म.सा. के मंच पर पहुँचते ही समूचे सभा मंडप में जयघोष और हर्ष ध्वनि के बीच श्रावक-श्राविकाओं ने भजनों पर मनोहारी नृत्य की प्रस्तुति देकर अपनी श्रद्धा का इजहार किया। शिविर का पहला दिन इतना प्रभावी रहा कि जिसने भी यह दृश्य देखा, वह आध्यात्मिक ऊर्जा से लबरेज हुए बिना नहीं रहा। सभा में मुख्यरूप से आयोजन से जुड़े महोत्सव समिति के अध्यक्ष अशोक डोशी, प्रिंसपाल टोंग्या, संजय पाटोदी, हुकमचंद जैन काका, प्रदीप ब्रह्मचारी, विनोद भैया, विजय दुर्रा, राहुल सेठी, सौरभ बडजात्या, विमल झांजरी, भूपेंद्र भोपाली, सोनाली बागडिया एवं अर्चना गोधा सहित बड़ी संख्या में आयोजन समिति के पदाधिकारियों ने सभी व्यवस्थाएं संभाली।
करीब 10 हजार साधकों की मौजूदगी में जब राष्ट्रसंत सुधासागर म.सा. ने उत्तम क्षमा धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि क्रोध शक्ति नहीं, बल्कि कमजोरी की निशानी है। व्यक्ति जब अपने से कमजोर या गरीब अथवा अपने अधीन व्यक्ति पर क्रोध करता है तब वह अपनी ताकत नहीं बल्कि अपनी कमजोरी प्रदर्शित करता है। अपने से कमजोर और अपने से अधिक शक्तिशाली पर भी क्रोध नहीं करना चाहिए। अपने पूज्य माता-पिता, गुरु एवं भगवान-इन सबके प्रति किसी भी स्थिति में क्रोध नहीं करना चाहिए। यदि हम किसी को सहारा नहीं दे सकते और उसे धक्का देने का अधिकार भी हमें नहीं है। यदि हम गिरे हुए को उठा नहीं सकते तो उसे गिराने और यदि किसी के आंसू नहीं पोंछ सकते तो उसे रुलाने का भी हक़ हमको नहीं है। भगवान के सामने झुकना भक्ति है लेकिन यदि किसी छोटे से छोटे जीव की रक्षा के लिए झुकना पड़े तो वह अहिंसा और करुणा होगी।
विद्या-सुधा मंडप के खचाखच भरे सभागृह में राष्ट्रसंत ने समझाया कि सच्ची भक्ति की परीक्षा तक होती है जब परिस्थितियां हमारे अनुकूल न हो। भगवान और गुरु के प्रति हमारी श्रद्धा किसी स्वार्थ या कामना पर आधारित नहीं होना चाहिए। काम पूरा हो तो भगवान को मानना और काम पूरा न हो तो भगवान से नाराज हो जाना भक्ति नहीं होगी। जो हमारे पूजनीय हैं, उन्हें अपने अनुकूल बनाने का प्रयास करने के बजाय हमें स्वयं उनके अनुकूल बनने का प्रयास करना चाहिए और जो हमसे कमजोर हैं उन्हें अपने समान बनाने का प्रयास होना चाहिए – यही उत्तम क्षमा, करुणा, अहिंसा और सच्चे संस्कार का मार्ग है। कमजोर का शोषण करना, अपनी शक्ति का दुरूपयोग करना और अपने ही लोगों पर क्रोध करना अंततः व्यक्ति के पतन का करण बनता है। आज जरूरत इस बात की है कि हम केवल मिच्छामी दुक्कडम कहकर क्षमा न मांगे बल्कि क्षमा को अपने व्यवहार और जीवन का हिस्सा भी बनाएं।
पुण्यार्जक आकाश कोयला ने बताया कि प.पू. सुधासागर म.सा की निश्रा में संस्कार शिविर का पहला आयोजन 1993 में ललितपुर में 125 श्रावकों की उपस्थिति में हुआ था। इसके बाद क्रमश शिविरार्थियों की संख्या बढ़ते बढ़ते अब इंदौर में 10 हजार तक पहुँच गई है। इस शिविर में सामान्य श्रावकों के अलावा उच्च शिक्षित, युवा, उद्योगपति, अभिभाषक, प्रशासनिक अधिकारी, इंजीनियर एवं अन्य प्रतिष्ठितजन भी भाग ले रहे हैं। इस दौरान शिविर में रहने वालों को 30 नियमों की आचार संहिता का पालन करना होगा जिसमें वे अपने सारे संसारी वैभव छोड़कर तीर्थंकरों और मुनियों जैसी साधना की जीवनचर्या अपनाएंगे। इन सभी श्रावकों को शहर के हजारों परिवारों ने अपने आतिथ्य का आत्मीय आमंत्रण भी दिया है। सभी श्रावक प्रतिदिन अलग-अलग घरों का आतिथ्य स्वीकार करेंगे।
