
गोमटगिरी के मामले में राष्ट्रसंत सुधासागर म.सा. ने कहा – कोई भी निर्णय
जल्दबाजी में नहीं लें, सब लोग मिल-बैठकर समय रहते विचार करें
सभी ट्रस्टियों द्वारा दिए गए सामूहिक इस्तीफे पर मुनिराज बोले – अभी भी समय है, गलती को रोका जा सकता है
इंदौर, 30 सितम्बर। गोमटगिरी ट्रस्ट के पदाधिकारियों द्वारा दिए गए सामूहिक इस्तीफे के बाद राष्ट्रसंत मुनिश्री सुधासागर म.सा. ने वीआईपी रोड स्थित किला मैदान, दलाल बाग परिसर में निर्मित विद्या-सुधा मंडप में चल रहे चातुर्मास महोत्सव में बुधवार को नियमित धर्मसभा में कहा कि इंदौर में समाज की जो इतनी बड़ी सम्पत्ति और संस्था बरसों के सहयोग से बनी है उसके सम्बन्ध में कोई भी बड़ा निर्णय जल्दबाजी में नहीं होना चाहिए। मैं इंदौर के समाज, ट्रस्ट के पदाधिकारियों, विद्वानों, वकीलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सभी जिम्मेदार लोगों से आग्रह करता हूँ कि वे बैठकर विचार करें कि जो निर्णय लिया जा रहा है, वह वास्तव में समाजहित में है या नहीं। अभी भी समय है, गलती को रोका जा सकता है। मेरा आग्रह है कि कुछ दिन रूककर पूरे मामले में क़ानूनी, सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से विचार किया जाए तथा जरुरी हो तो ट्रस्ट की बैठक बुलाएं, विशेषज्ञों से राय लें और समाज के सामने पूरी स्थिति रखें।
गोमटगिरी ट्रस्ट के सभी पदाधिकारियों द्वारा मंगलवार को राष्ट्रसंत प.पू. सुधासागर म.सा. के 44 वें दीक्षा दिवस के पावन अवसर पर अपने त्यागपत्र उनको समर्पित किए गए हैं। सभी ट्रस्टियों ने गोमटगिरी तीर्थ क्षेत्र को समाज की सामूहिक धरोहर मानकर उसके भविष्य के विकास एवं संरक्षण के लिए राष्ट्रसंत से मार्गदर्शन का निवेदन किया है। ट्रस्टियों के इस कदम पर मुनिश्री सुधासागर म.सा. ने बुधवार को सुबह धर्मसभा में कहा कि समाज की सम्पत्ति, समाज की धरोहर है जिसपर समय रहते निर्णय लेना चाहिए। मैंने अपना जीवन समाज और राष्ट्र के कार्यों को समर्पित किया है। मेरे लिए किसी संस्था, ट्रस्ट या सम्पत्ति पर व्यक्तिगत अधिकार का कोई प्रश्न नहीं है। मैं आज हूँ, कल रहूँ या न रहूँ – मेरा उद्देश्य केवल इतना है कि जो कुछ समाज और धर्म के लिए है, वह समाज और धर्म के काम आए। मैं स्पष्ट कहना चाहता हूँ कि मेरे पास न कोई व्यक्तिगत एजेंडा है, न कोई निजी प्रोजेक्ट और न ही किसी सम्पत्ति को अपने अधिकार में लेने की इच्छा। मेरा उद्देश्य केवल समाज के हित में सही व्यवस्था स्थापित करना है। अभी समय है, मैं आग्रह करता हूँ कि कुछ दिनों के लिए रूककर पूरे विषय पर क़ानूनी, सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से विचार किया जाना चाहिए। जरुरी हो तो ट्रस्ट की बैठक बुलाएं, विशेषज्ञों से सलाह लें और समाज के सामने पूरी स्थिति रखें।
राष्ट्रसंत ने सभी महाराजों और साधु संतों से भी निवेदन किया कि वे अपनी-अपनी समितियों और समाज के लोगों को समझाएं कि इतना बड़ा निर्णय भावनाओं या जल्दबाजी में न लिया जाए। यदि यह संस्था भविष्य में पूरे भारतवर्ष के लोगों के लिए खुलती है तो इसका स्वरुप और भी व्यापक हो सकता है। आवश्यकता के अनुसार नाम, भवन, व्यवस्था और संचालन में परिवर्तन भी कानून और ट्रस्ट के नियमों के अनुसार विचाराधीन हो सकते हैं। भवन का नवीनीकरण हो या नया निर्माण – यह सब बाद का विषय है। मुख्य विषय है कि उद्देश्य क्या होगा और इसका लाभ किसे मिलेगा। मेरा किसी से व्यक्ति से विरोध नहीं है। मैं किसी के विरुद्ध व्यक्तिगत भावना से कोई कार्य नहीं करना चाहता। मेरा आग्रह केवल इतना है कि इंदौर की इतनी बड़ी सामाजिक और धार्मिक सम्पत्ति के सम्बन्ध में निर्णय लेते समय पूरे समाज की भावना और भविष्य की पीढ़ियों के हित को ध्यान में रखा जाए।
राष्ट्रसंत ने कहा कि मैं यह भी स्पष्ट करना चाहता हूँ कि यदि किसी संस्था या ट्रस्ट की व्यवस्था में परिवर्तन की आवश्यकता होगी तो वह क़ानूनी प्रक्रिया, पारदर्शिता और सामूहिक विचार विमर्श के साथ हो होना चाहिए। अभी भी समय है, इंदौर के लोग बैठें, ट्रस्ट के लोग बैठें, वकील और विशेषज्ञ अपनी राय दें, विज्ञान और संत अपना मार्गदर्शन दें और समाज मिलकर तय करें कि सही क्या है क्योंकि एक बार कोई बड़ा निर्णय हो गया, उसके बाद पछताने का अवसर नहीं मिल सकेगा। मैं समाज को लेकर केवल इतना कहना चाहता हूँ कि रोक सकते हैं तो अभी रोकिए, समझा सकते हैं तो अभी समझाइए, विचार करना है तो अभी कीजिए। कल यदि कोई बड़ा परिवर्तन करना पड़ा तो वह व्यक्तिगत इच्छा से नहीं बल्कि समाजहित और व्यापक जनकल्याण के उद्देश्य से होना चाहिए। मैं चाहता हूँ कि यह संस्था केवल इंदौर की न रहकर आवश्यकता और नियमों के अनुसार पूरे भारत के लिए उपयोगी और आदर्श संस्था बने लेकिन इसके लिए पहला कदम है – सही निर्णय, सही प्रक्रिया और समाज की सहमति।
