दलाल बाग पर सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में चल रही चातुर्मासिक धर्मसभा में आशीर्वचन

इंदौर, तपस्या अकेले की जा सकती है, धर्म अकेले किया जा सकता है और आत्म कल्याण की साधना भी अकेले की जा सकती है लेकिन जीवन की यात्रा विवेक और सही दिशा के साथ करना चाहिए। जीवन में सच्चे रास्ते पर चलना जरुरी है लेकिन किसी के पीछे आंख बंद करके चलना ठीक नहीं है।
ये दिव्य और प्रेरक विचार हैं संत शिरोमणि प.पू. विद्यासागर म.सा. के परम प्रभावक शिष्य और राष्ट्रसंत मुनि पुंगव प.पू. श्री सुधासागर महाराज के, जो उन्होंने सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में वीआईपी रोड स्थित किला मैदान, दलाल बाग परिसर में निर्मित विद्या-सुधा मंडप में चल रहे चातुर्मास महोत्सव में आयोजित नियमित धर्मसभा में उपस्थित साधकों को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। सभा का शुभारंभ मंगलाचरण के बाद सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद गोधा एवं राहुल सेठी ने पाद प्रक्षालन का सौभाग्य प्राप्त किया। गुरुवार को चातुर्मास के चक्रवती नवीन-शिवानी गोधा ने चाँदखेडी तीर्थ पर एक कमरे के निर्माण हेतु 11 कलश की राशि देने की घोषणा की और स्वयं अभिषेक कर पुण्यार्जन भी प्राप्त किया। इस अवसर पर पुलक मंच के संरक्षक कमल-किरण रावका ने बोली के माध्यम से आरती का पुण्यार्जन प्राप्त किया। देशभर से आए साधकों एवं अन्य श्रेष्ठिजनों की अगवानी चक्रवर्ती अध्यक्ष नवीन गोधा, सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद गोधा, चक्रवर्ती मनीष गोधा, महोत्सव अध्यक्ष अशोक डोसी, महामंत्री हर्ष जैन, विजय पाटोदी, आकाश कोयला, प्रिंसपाल टोंग्या, संजय पाटोदी, सौरभ बडजात्या, राहुल सेठी, भूपेंद्र भोपाली सहित अनेक सहयोगी बंधुओं ने की।
राष्ट्रसंत ने धर्मसभा में कहा कि संसार में हमें जो सुख-सुविधाएँ प्राप्त हुई हैं, उनका उपयोग पूरे विवेक के साथ करना चाहिए। स्वस्थ शरीर का उपयोग केवल भोग विलास के लिए नहीं, तप, त्याग, धर्म उपवास और एटीएम कल्याण के लिए होना चाहिए। संसार की वस्तुओं काउपयोग करना गलत नहीं है लेकिन उन्हें अपना स्थायी सुख मान लेना और उनमें आसक्त हो जाना आत्म कल्याण के मार्ग में बाधक बन सकता है। भगवान और गुरु को अपने स्वार्थ का साधन न बनाएं। सच्ची भक्ति यह नहीं है कि भगवान मेरे लिए क्या करेंगे बल्कि यह है कि मैं भगवान के बताए मार्ग पर चलकर अपने जीवन को कैसे बदलूँ। गुरु का ज्ञान, गुरु का प्रेम पर गुरु का आशीर्वाद हमारे जीवन के लिए महान वरदान होता है। जब कभी जीवन में नुकसान हो, शांत रहें। जब अपमान हो, संयम रखें। जब अपेक्षा पूरी न हो, मोह छोड़ दें और जब कर्म का परिणाम सामने आए तो उसे स्वीकार करें। यही से धर्म, तप और आत्म शुद्धि प्रारम्भ होती है।
