तिलक नगर क्षेत्र के कृषि विहार उद्यान में चल रहे शिवपुराण ज्ञान यज्ञ में कार्तिकेय एवं गणेश के जन्मोत्सव की धूम

इंदौर शिव पुराण की कथा का श्रवण करना प्रयागराज के कुंभ मेले में स्नान करने जैसा ही पुण्यशाली है। शिव ऐसे देव हैं, जो हमें मुक्ति, गति और भक्ति भी प्रदान करते है। शिव पुराण की कथा मन पर पड़े माया के आवरण को हटाती है। माया का मकड़जाल मनुष्य को जीवनभर भटकता रहता है। माया के मोहपाश से मुक्ति के लिए भगवान शिव की आराधना सबसे श्रेष्ठ मानी गई है क्योंकि शिव पुराण भी स्वयं भगवान द्वारा रचे गए शब्दों की ही ऐसी जन कल्याणकरी कृति है, जो दुर्लभ मनुष्य जीवन को सही दिशा में ले जाने का मार्ग प्रशस्त करती है।
तिलक नगर क्षेत्र के कृषि विहार उद्यान स्थित श्री पीपलेश्वर महादेव मंदिर पर चल रही शिव महापुराण कथा में श्रीधाम वृन्दावन के प्रख्यात आचार्य पं. शिवेंद्र कृष्ण शास्त्री ने कार्तिकेय और गणेश जन्म प्रसंग की व्याख्या के दौरान उक्त दिव्य विचार व्यक्त किए। कथा में जन्मोत्सव भी धूमधाम से मनाया गया। भजन गायक नीता मिश्रा के मनोहारी भजनों पर सैकड़ों श्रद्धालु थिरकते रहे। कथा शुभारंभ के पूर्व यजमान समूह की ओर से पिंटू नामदेव, विजय मिश्रा, अभिनय सोनकर, अनिल देशमुख, अनिल जाट, प्रवीण पुरोहित, अनीश पाण्डेय आदि ने व्यासपीठ का पूजन किया। विद्वान वक्ता की अगवानी नीता मिश्रा, सुनीता देशमुख, भावना जाट, सीमा मिश्रा, रचना सोनकर, कृष्णा पुरोहित, पिंकी पाण्डेय सहित सैकड़ों श्रद्धालुओं ने की और शिवपुराण का पूजन संजय खादीवाला, छत्रपाल सोलंकी एवं विजय मिश्रा ने किया। संयोजक पिंटू नामदेव ने बताया कि पं. शिवेंद्र कृष्ण शास्त्री 25 अगस्त तक यहाँ प्रतिदिन दोपहर 3 से शाम 6 बजे तक शिवपुराण कथामृत की वर्षा करेंगे। कथा के दौरान तुलसी-जालंधर कथा, शिवरात्रि व्रत कथा सहित भगवान शिवाशिव की आराधना से जुड़े विभिन्न प्रसंगों की संगीतमय व्याख्या होगी। कथा में विभिन्न उत्सव भी मनाए जाएँगे।
पं. शास्त्री ने कहा कि हमें अपने आत्मस्वरूप का बोध होना चाहिए। इस बोध को भूल गए तो भटकना तय है। यह भटकाव परमात्मा की भक्ति और सत्संग से ही दूर हो सकता है। भगवान गणेश जन्म के पूर्व से ही विलक्षण रहे। पिता और माता के विवाह में पुत्र के पूजन का अनूठा उदाहरण मिलता है। माता पिता की परिक्रमा को तीर्थ यात्रा का दर्जा देने वाले भगवान गणेश ही हैं। उनके द्वारा स्थापित परंपरा भारतीय समाज में आज भी प्रासंगिक और शास्वत मानी जाती है। देश में जितने मंदिर राम और कृष्ण के हैं, उससे भी अधिक गणेशजी के हैं। हमारी भक्ति में दृढ़ता होना चाहिए। जिस दिन हम इस दृढ़ता के साथ भक्ति में लीन हो जाएंगे, उस दिन हमें भगवान के आनंद सिंधु होने की बात भी अनुभूत हो जाएगी।
