दलाल बाग पर चल रहे चातुर्मास अनुष्ठान की महती धर्मसभा में राष्ट्रसंत के प्रेरक आशीर्वचन – जैन छात्रावास के बच्चों ने दी सांस्कृतिक प्रस्तुतियां

इंदौर आज के दौर में सबसे ज्यादा जरूरत युवाओं को सुधारने की है और उनसे भी ज्यादा जरूरत है माता-पिता को सुधारने की। हम बड़े लोग सुधर जाएँगे तो हमारे बच्चे भी संस्कारित ही बनेंगे। हमारे जैन छात्रावासों में रहने वाले बच्चों में से एक बच्चा भी मुनि बन गया तो समाज का जीवन धन्य हो जाएगा। माताए जींस पहनना, काले चश्मे लगाना, मोबाइल चलाना और अन्य आदतें सुधार लें तो हमारी बेटियां भी सुधर जाएंगी। जो माता-पिता आकर कहते हैं कि बच्चे बिगड़ रहे हैं, उन्हें समझना चाहिए कि पहले हम स्वयं सुधरें, फिर बच्चों की शिकायत करें। एक बेटा शिक्षित होकर जब अस्पताल, स्कूल और भोजनशाला खोलता है तो अनेकों लोगों का भला और कल्याण कर सकता है। जिस दिन हमने अपने बच्चों को संस्कारित बना दिया, उस दिन हमारी गोद में भी कोई तीर्थंकर खेल सकता है। कौन नहीं चाहता कि मैं तीर्थंकर का पिता बनूँ। आजकल लोग भगवान नहीं बनना चाहते, वे तो सीधे भगवान का पिता ही बनना चाहते हैं।
ये दिव्य विचार हैं संत शिरोमणि प.पू. विद्यासागर म.सा. के परम प्रभावक शिष्य और राष्ट्रसंत मुनि पुंगव प.पू. श्री सुधासागर महाराज के, जो उन्होंने रविवार को सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में दलाल बाग के विशाल विद्या-सुधा सत्संग मंडप में चल रहे चातुर्मास के दौरान अपने आशीर्वचन में व्यक्त किए। आज शिवपुरी जिले के खनियाधाना स्थित संत सुधासागर छात्रावास में पढने वाले 500 से अधिक बच्चे भी टोपी एवं श्वेत परिधान पहनकर धर्मसभा में शामिल हुए और प्रवचन के पश्चात अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शानदार प्रस्तुतियां देकर देशभर से आए समाज बंधुओं को सम्मोहित बनाए रखा। प्रारम्भ में चातुर्मास आयोजन समिति के शिवानी-नवीन गोधा, तृप्ति-हर्ष जैन, सपना-मनीष गोधा, अंतिका-आनंद गोधा एवं दीपिका-आकाश जैन कोयला ने सभी साधकों की अगवानी की। पर्यूषण महापर्व पर 15 सितम्बर से श्रावक संस्कार शिविर का आयोजन भी होगा जिसके लिए पंजीयन प्रारम्भ हो गए हैं। दलाल बाग पर प्रतिदिन सुबह 8 से 9.30 बजे तक राष्ट्रसंत की अमृत वर्षा का क्रम जारी है।
महाराजश्री ने कहा कि दुनिया में ऐसे लोग भी हैं जिन्हें दिन में नहीं, रात में ही नजर आता है। कुछ ऐसे लोग भी हैं जो चाहते हैं कि केवल अँधेरा ही रहे, रोशनी न रहे। सबकी अपनी-अपनी चाहत और अपनी-अपनी दृष्टि है। हर कोई अपने-अपने स्वार्थ की दृष्टि से इस स्थिति का आकलन करता है। जिन शासन की दृष्टि से देखें तो जब-जब हमारा पुण्य क्षय होता है, हमारी शक्ति क्षय होती है। आप लोग दिनरात मेहनत कर धन अर्जन करते हैं लेकिन यह सारा पैसा कहाँ जा रहा है, इस पर भी चिंतन करें। व्यापारी समाज एक घंटे मेहनत कर शेष 23 घंटे की व्यवस्था कर पूरे परिवार का पेट पाल लेता है लेकिन मुझे अपने भक्तों के दिमाग पर पूरा विश्वास है कि उनकी खोपड़ी कमजोर नहीं हो सकती। बच्चों को चाहिए कि वे अपने पिता की सम्पत्ति और वसीयत को कर्ज मानकर वापरें। कई लोग हैं जो पिता की वसीयत पर मौज-मस्ती कर रहे हैं। जब तक बच्चे स्वयं अपनी कमाई शुरू नहीं कर देते तब तक उन्हें पिता की सम्पत्ति को कर्ज मानकर ही उपयोग करना चाहिए। कर्ज कोई भी व्यक्ति मज़बूरी में ही लेता है। स्कूल फीस, यूनिफार्म और जेब खर्च के अलावा पिता से और कुछ धन नहीं लेना चाहिए। किसी और का कर्ज भले ही न चुका पाएं लेकिन माता-पिता के पैसों का पाई-पाई का हिसाब जरुर रखना चाहिए। जीवन में कोई भी चीज यदि बिना मांगे मिले तो उसका मोल अलग होता है। बिना मांगे जो मिलता है वह मोती होता है और मांगने से जो मिलता है उसे भीख कहते हैं। अपने गुरु और अपने माता-पिता से जो कुछ बिना मांगे मिलेगा वह हमारी जिन्दगी को धन्य बना देगा।
