दलाल बाग में चल रही चातुर्मास की धर्मसभा में प्रेरक और ओजस्वी आशीर्वचन-दिनोंदिन उमड़ रहा साधकों का सैलाब

इंदौर मनुष्य भगवान, गुरु और धर्म का आश्रय मिलते ही निश्चिन्त होकर अपने पुरुषार्थ को छोड़ देता है – यही मनुष्य की सबसे बड़ी भूल है। भगवान का भरोसा जागने के लिए होता है, सोने के लिए नहीं। डर से कराया गया धर्म स्थायी नहीं हो सकता। गुरु के डर से हम सामायिक या नर्क के भय से पाप कर्म छोड़ दें तो यह पर्याप्त नहीं होगा। धर्म हमारे जीवन में तभी उतरेगा जब हम उसे अपने स्वभाव और कर्तव्य के रूप में स्वीकार करेंगे। हमें धन-दौलत और संसार के सभी ऐश्वर्य फिर से मिल जाएँगे लेकिन इस वर्ष मिला संत-सानिध्य ज्ञान और संस्कार अगले वर्ष भी मिलेगा ही, इसकी कोई गारंटी नहीं इसलिए चातुर्मास और संस्कार शिविर के प्रत्येक अवसर को दुर्लभ मानकर इनका पूरा पुण्य लाभ उठाना चाहिए।
ये दिव्य और प्रेरक विचार हैं संत शिरोमणि प.पू. विद्यासागर म.सा. के परम प्रभावक शिष्य और राष्ट्रसंत मुनि पुंगव प.पू. श्री सुधासागर महाराज के, जो उन्होंने सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में वीआईपी रोड स्थित किला मैदान, दलाल बाग परिसर में निर्मित विद्या-सुधा मंडप में चल रहे चातुर्मास महोत्सव की धर्मसभा में व्यक्त किए। सभा का शुभारंभ मंगलाचरण एवं पाद प्रक्षालन के साथ हुआ। प्रारम्भ में आयोजन समिति की ओर से चक्रवर्ती अध्यक्ष नवीन-शिवानी गोधा, सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद-अंतिका गोधा, महामंत्री हर्ष-तृप्ति जैन, मनीष-सपना गोधा एवं आकाश-दीपिका जैन कोयला आदि ने देशभर से आए साधकों की अगवानी की। इस अवसर पर महोत्सव समिति के अध्यक्ष अशोक डोसी, विजय पाटोदी, हुकमचंद जैन काका, संजय पाटोदी, प्रिंसपाल टोंग्या, भूपेंद्र भोपाली एवं अन्य सहयोगी बंधुओं ने सभा की व्यवस्थाओं में सहयोग प्रदान किया। मीडिया प्रभारी राहुल सेठी ने बताया कि दलाल बाग पर पर्यूषण महापर्व पर 15 सितम्बर से होने वाले श्रावक संस्कार शिविर के प्रति देशभर के साधकों का जबरदस्त उत्साह देखने को मिल रहा है। शिविर में प्रतिदिन 500 से 700 नए पंजीयन का क्रम जारी हैं। सभा में दिनोंदिन देशभर से आने वाले साधकों का सैलाब उमड़ रहा है। दलाल बाग पर प्रतिदिन सुबह 8 से 9.30 बजे तक राष्ट्रसंत के प्रवचनों की अमृत वर्षा का क्रम जारी है।
राष्ट्रसंत प.पू. सुधासागर म.सा. ने कहा कि माँ की गोद संसार का सबसे श्रेष्ठ स्थान है लेकिन माँ की गोद केवल सुलाने के लिए नहीं, संस्कार और शिक्षा देने की पहली पाठशाला होती है। इसी तरह गुरु की छाया विश्राम के लिए नहीं, जागने और जीवन बदलने के लिए होती है। योग्यता वस्तु में होती है, और निमित्त उसे प्रकट करने का माध्यम होता है। जैसे दीपक में जलने की योग्यता होती है इसलिए माचिस उसे जला सकती है। गुरु और संतों का सानिध्य निमित्त है क्योंकि ज्ञान ग्रहण करना और पुरुषार्थ करना हमारी स्वयं की जिम्मेदारी है। हमारी सबसे बड़ी भूल यह होती है कि हम भगवान, गुरु और धर्म का आश्रय मिलते ही निश्चिन्त या बेफिक्र होकर अपने पुरुषार्थ छोड़ देते हैं लेकिन याद रखें कि भगवान का भरोसा जागने के लिए है, सोने के लिए नहीं। संस्कार शिविर आत्म जागरण का महत्वपूर्ण माध्यम है। यहाँ बच्चे केवल धार्मिक बातें सुनने नहीं, बल्कि उन्हें जीवन में उतारने की प्रेरणा प्राप्त करेंगे। सच्चा शिष्य वही है जो गुरु से मिले ज्ञान का चिंतन, मनन और अध्ययन करता है। गुरु का मिलना मंजिल नहीं बल्कि स्वयं को बदलने का अवसर है। भगवान मिल जाए तो जागो, गुरु मिले तो ज्ञान लो और संस्कार शिविर का अवसर हो तो अपने बच्चों के संस्कारों की नींव को मजबूत बनाएं।
