
दलाल बाग में चल रही चातुर्मास की धर्मसभा में प्रेरक और ओजस्वी आशीर्वचन – मंत्री सिलावट ने भी लिए शुभाशीर्वाद
इंदौर दुनिया को धोखा दिया जा सकता है लेकिन अपनी आत्मा और परमात्मा को नहीं। माता-पिता और गुरु के सामने झूठ, छल-कपट या कोई भी महत्वपूर्ण बात छिपाना नहीं चाहिए। मन में कोई गलत विचार अथवा समस्या हो तो उसे पूरे विश्वास के साथ साझा करना चाहिए। दान के लिए बड़ी धनराशि की नहीं अपितु निर्मल भाव और अपनी सामर्थ्य के अनुसार त्याग का संकल्प होना आवश्यक है। सच्चा वैराग्य किन्तु-परन्तु अथवा बहाने नहीं बनाता बल्कि ईमानदारी से उस मार्ग की खोज करता है। अपनी जिन्दगी की किताब हमें अपने माता-पिता के सामने हमेशा खुली रखना चाहिए।
ये दिव्य और प्रेरक विचार हैं संत शिरोमणि प.पू. विद्यासागर म.सा. के परम प्रभावक शिष्य और राष्ट्रसंत मुनि पुंगव प.पू. श्री सुधासागर महाराज के, जो उन्होंने सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में वीआईपी रोड स्थित किला मैदान, दलाल बाग परिसर में निर्मित विद्या-सुधा मंडप में चल रहे चातुर्मास महोत्सव की धर्मसभा में व्यक्त किए। सभा का शुभारंभ मंगलाचरण एवं पाद प्रक्षालन के साथ हुआ। प्रारम्भ में आयोजन समिति की ओर से चक्रवर्ती अध्यक्ष नवीन-शिवानी गोधा, सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद-अंतिका गोधा, महामंत्री हर्ष-तृप्ति जैन, मनीष-सपना गोधा एवं आकाश-दीपिका जैन कोयला आदि ने देशभर से आए साधकों की अगवानी की। राज्य के जल संसाधन मंत्री तुलसी सिलावट ने भी राष्ट्रसंत से शुभाशीर्वाद प्राप्त कर राज्य शासन की ओर से उनका अभिनन्दन किया। इस अवसर पर महोत्सव समिति के अध्यक्ष अशोक डोसी, विजय पाटोदी, हुकमचंद जैन काका, संजय पाटोदी, प्रिंसपाल टोंग्या, भूपेंद्र भोपाली एवं अन्य सहयोगी बंधुओं ने सभा की व्यवस्थाओं में सहयोग प्रदान किया। मीडिया प्रभारी राहुल सेठी ने बताया कि दलाल बाग पर पर्यूषण महापर्व पर 15 सितम्बर से होने वाले श्रावक संस्कार शिविर के प्रति देशभर के साधकों का जबरदस्त उत्साह देखने को मिल रहा है। शिविर में प्रतिदिन 500 से 700 नए पंजीयन का क्रम जारी हैं। सभा में दिनोंदिन देशभर से आने वाले साधकों का सैलाब उमड़ रहा है। दलाल बाग पर प्रतिदिन सुबह 8 से 9.30 बजे तक राष्ट्रसंत के प्रवचनों की अमृत वर्षा का क्रम जारी है।
राष्ट्रसंत प.पू. सुधासागर म.सा. ने भगवान कृष्ण और माता यशोदा के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि माता-पिता ही हमारे सच्चे पालनहार या हितैषी होते हैं। माता-पिता और गुरु से झूठ एवं छल-कपट रखकर कोई बात कभी नहीं छिपाना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को संकल्प लेना चाहिए कि वह अपने माता-पिता, गुरु और भगवान के समक्ष हमेशा सत्य एवं निष्कपट जीवन जिएगा। मनुष्य अपने दुःख और असफलता के लिए दूसरों या हालातों को दोष देता है जबकि सुधार की शुरुआत स्वयं से होनी चाहिए। “मैं बुरा हूँ तो जगत भी बुरा है” जैसी सोच व्यक्ति को आत्मचिंतन से दूर करती है। हमें निमित्त को दोष देने के बजाय अपने भाव, कर्म और पुरुषार्थ को देखना चाहिए। दूसरों को सुधारने से पहले हम स्वयं को सुधारें, यही जीवन का सबसे बड़ा सूत्र होना चाहिए।
