
दलाल बाग में चल रही चातुर्मास की धर्मसभा में प्रेरक आशीर्वचन – श्रावक संस्कार शिविर के लिए दस हजार से अधिक पंजीयन
इंदौर मनुष्य की इच्छाएँ कभी समाप्त नहीं होती इसलिए वास्तविक तृप्ति इन इच्छाओं के निरोध और आत्मसंतोष में ही संभव है। जीवन को पवित्र विचारों, संस्कारों और श्रेष्ठ आदर्शों के सरोवर से जोड़ना जरुरी है। इनके अभाव में जीवन को सही दिशा नहीं मिल पाएगी। मन, वचन, काया और दृष्टि की पवित्रता ही हमें सही मार्ग की ओर प्रशस्त करेगी। हमारा जीवन ऐसी नदी की तरह होना चाहिए जो अपना मार्ग स्वयं बनाते हुए आगे बढती रहती है। खाली गड्ढा बहती हुई नदी को रोक लेता है जबकि भरा हुआ गड्ढा नदी को अपने ऊपर से बहने देता है। विचार करें कि हमारा मन इच्छाओं से खाली है या संतोष से भरा हुआ।
ये प्रेरक और ओजस्वी विचार हैं संत शिरोमणि प.पू. विद्यासागर म.सा. के परम प्रभावक शिष्य और राष्ट्रसंत मुनि पुंगव प.पू. श्री सुधासागर महाराज के, जो उन्होंने सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में वीआईपी रोड स्थित किला मैदान, दलाल बाग परिसर में निर्मित विद्या-सुधा मंडप में चल रहे चातुर्मास महोत्सव की धर्मसभा में व्यक्त किए। सभा का शुभारंभ मंगलाचरण एवं पाद प्रक्षालन के साथ हुआ। प्रारम्भ में आयोजन समिति की ओर से चक्रवर्ती अध्यक्ष नवीन-शिवानी गोधा, सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद-अंतिका गोधा, महामंत्री हर्ष-तृप्ति जैन, मनीष-सपना गोधा एवं आकाश-दीपिका जैन कोयला आदि ने देशभर से आए साधकों की अगवानी की। इस अवसर पर महोत्सव समिति के अध्यक्ष अशोक डोसी, विजय पाटोदी, संजय पाटोदी, प्रिंसपाल टोंग्या, रमेश जैन निर्वाणा, सौरभ बडजात्या, विमल झांझरी, राहुल सेठी, अर्चना गोधा, सुनीता सेठी, अलका झांझरी एवं भूपेंद्र भोपाली सहित अनेक सहयोगी बंधुओं ने विभिन्न व्यवस्थाओं में सहयोग प्रदान किया। दलाल बाग पर पर्यूषण महापर्व पर 16 सितम्बर से होने वाले श्रावक संस्कार शिविर के प्रति देशभर के साधकों का जबरदस्त उत्साह देखने को मिल रहा है। धर्मसभा के दौरान प्रतिदिन आचार्य भगवंत एवं मुनि संघ के जयकारों से समूचा सभामंडप गुंजायमान बन रहा है। उम्मीद है कि इस शिविर में दस हजार से अधिक साधक देश-विदेश से आकर शामिल होंगे। दलाल बाग पर प्रतिदिन सुबह 8 से 9.30 बजे तक राष्ट्रसंत के प्रवचनों की अमृत वर्षा का क्रम जारी है।
राष्ट्रसंत प.पू. सुधासागर म.सा. ने कहा कि शिक्षक वह है जो पढाता है लेकिन गुरु वह है जो कराता है। जीवन में केवल किताबी ज्ञान पर्याप्त नहीं है। जो ज्ञान को व्यवहार में उतारता है वही वास्तविक ज्ञानी बन सकता है। भगवान, गुरु और मंदिर से केवल कुछ पाने की अपेक्षा न रखें बल्कि यह भावना रखें कि मुझे कुछ करना है, मुझे कुछ बनना है, मैं चलूँगा और मैं करूँगा भी। वास्तविक धनवान वही है जो गरीब को नौकर बनाने के लिए नहीं बल्कि उसे अपने समान समर्थ बनाने के लिए खोजे। जिसके पास भोजन है वह उस व्यक्ति को पहले खिलाए जिसके पास भोजन नहीं है। जिसके पास ज्ञान है वह अज्ञानी को ज्ञान दे और जिसके पास सामर्थ्य है वह असमर्थ की सहायता करे। धर्म का वास्तविक स्वरुप यही है कि धर्मात्मा व्यक्ति बुराई में फंसे व्यक्ति को देखकर उसे सुधारने का प्रयास करे। स्वयं कुछ पाने की भावना से ऊपर उठकर करने, बनने और देने की भावना विकसित करना ही धर्म का वास्तविक स्वरुप होगा।
