
दलाल बाग स्थित विद्या-सुधा मंडप में देश-विदेश से आए हजारों श्रावकों को राष्ट्रसंत के पावन सानिध्य में मिल रही प्रेरणा
इंदौर
तीर्थ हमारे लिए केवल पर्यटन स्थल नहीं बल्कि संतो की साधना और निर्वाण से पवित्र हुए क्षेत्र हैं। तीर्थभूमि पर गंदगी, थूकना, अनुशासनहीनता अथवा वहां की पवित्रता को प्रभावित करने वाली गतिविधियों को कतई उचित नहीं माना जा सकता। हम वन्दना करें या न करें, लेकिन तीर्थस्थल को अपने किसी भी कर्म का कारण से अपवित्र न बनाएं। इस स्थिति में प्रत्येक व्यक्ति को संकल्प लेना चाहिए कि मैं अपने कारण किसी भी तीर्थ को अशुद्ध नहीं होने दूंगा। गिरनार सम्मेद शिखर और गिरनारजी जैसे सिद्ध क्षेत्रों की पवित्रता बनी रहना चाहिए। हम सबको यह चिन्तन भी करना होगा कि कहीं मेरे कारण भारत भूमि पर कलंक तो नहीं आएगा और कहीं मेरी वजह से भारतीय संस्कृति तो कलंकित या लांछित नहीं होगी।
उक्त प्रेरक और दिव्य विचार हैं संत शिरोमणि प.पू. विद्यासागर म.सा. के परम प्रभावक शिष्य और राष्ट्रसंत मुनि पुंगव प.पू. श्री सुधासागर महाराज के, जो उन्होंने सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में वीआईपी रोड स्थित किला मैदान, दलाल बाग परिसर में निर्मित विद्या-सुधा मंडप में चल रहे चातुर्मास महोत्सव में पर्युषण महापर्व की धर्मसभा में ने शनिवार को चौथे दिन उत्तम शौच धर्म का सन्देश देते हुए व्यक्त किए। धर्मसभा में प्रमुख रूप से चक्रवर्ती अध्यक्ष नवीन गोधा, सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद गोधा, मनीष गोधा एवं शिविर के पुण्यार्जक आकाश जैन कोयला परिवार आदि ने देशभर से आए 10 हजार से अधिक शिविरार्थियों की आत्मीय अगवानी की। सभा का शुभारंभ मंगलाचरण एवं पाद प्रक्षालन के साथ हुआ। इस अवसर पर महोत्सव अध्यक्ष अशोक डोसी, प्रिंसपाल टोंग्या, संजय पाटोदी, प्रदीप ब्रह्मचारी, विनोद भैया, विजय दुर्रा, सौरभ बडजात्या, राहुल सेठी, भूपेंद्र भोपाली, सोनाली बागडिया एवं अर्चना गोधा सहित अनेक सहयोगी बंधुओं ने विभिन्न व्यवस्थाओं में सहयोग प्रदान किया। दलाल बाग पर प्रतिदिन सुबह 9 से 10.30 बजे तक राष्ट्रसंत के प्रवचनों की अमृत वर्षा का क्रम जारी है। यहाँ चल रहे श्रावक संस्कार शिविर और दस लक्षण महापर्ण में देश-विदेश से आए हजारों समाज बंधु पूरे उत्साह के साथ अपनी तप साधना में जुटे हुए हैं।
राष्ट्रसंत ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को यह भी सोचना चाहिए कि उसके आचरण से परिवार, संतान और पूरे समाज की प्रतिष्ठा तो प्रभावित नहीं हो रही है। माता-पिता को भी ऐसा जीवन जीना चाहिए कि उनके कारण संतान का सिर न झुके और संतान भी ऐसा आचरण करे कि माता-पिता को कभी शर्मिंदा न होना पड़े। प्रत्येक जैन को अपने व्यवहार से यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसकी व्यक्तिगत गलती के कारण पूरे समाज की प्रतिष्ठा पर आंच नहीं आना चाहिए। शिविर में आए साधकों को प्रेरणा देते हुए महाराजश्री ने कहा कि शिविर में आना ही पर्याप्त नहीं है, शिविर की मर्यादा और अनुशासन को भी जीवन में उतारना आवश्यक है। पांडाल, भोजन स्थल, बस या अन्य किसी स्थान पर शिविरार्थी का व्यवहार ऐसा होना चाहिए कि लोग कहें कि देखो, यह श्रावक संस्कार शिविर का शिविरार्थी है। दस दिनों तक भगवान और गुरु की वाणी सुनने के बाद हमारी आँखे, कान, जुबान और भोजन की आदतों में भी परिवर्तन दिखाई देना चाहिए। शिविर की वास्तविक सफलता तभी होगी जब शिविर के समापन के बाद भी हमारे जीवन में उसके संस्कार दिखाई दें।
श्रावक संस्कार शिविर में उमड़ा समाज बंधुओं का सैलाब – चातुर्मास के चक्रवर्ती मनीष-सपना गोधा, नवीन-शिवानी गोधा, आनंद-अंतिका गोधा एवं शिविर के प्रमुख पुण्यार्जक चक्रवर्ती आकाश-आलोक जैन कोयला ने बताया कि पर्यूषण महापर्व के चौथे दिन शनिवार को भी शिविर में 10 हजार से अधिक समाज बंधुओं की मौजूदगी बनी रही। प्रवचन के दौरान अनेक अवसरों पर राष्ट्रसंत, जिनवाणी एवं जिनशासन के साथ महावीर स्वामी के जयघोष एवं हर्षध्वनि के दृश्य भी देखने, सुनने को मिल रहे हैं। शहर में रहने वाले दिगम्बर जैन परिवारों की ओर से शिविरार्थियों के लिए प्रतिदिन भोजन का आमंत्रण भी दिया जा रहा है जो शहर के इतिहास में पहली बार हो रहा है। बड़ी संख्या में बाहर से आने वाले श्रावक इंदौर की इस आतिथ्य परम्परा और शिविर की व्यवस्थाओं को देखकर गदगद नजर आ रहे हैं।
