देशभर से आए साधकों ने सामूहिक महाअर्ध्य देकर लिया धर्म, साधु-संतों, श्रमण संस्कृति एवं देव, शास्त्र और गुरु की रक्षा का संकल्प
इंदौर

वीआईपी रोड स्थित दलाल बाग के विशाल परिसर में निर्मित विद्या-सुधा मंडप में शुक्रवार को रक्षाबंधन के पावन महापर्व पर राष्ट्रसंत प.पू. सुधासागर म.सा. के पावन सानिध्य में देशभर से आए करीब 10 हजार समाज बंधुओं ने धर्म, साधु-संतों और श्रमण संस्कृति के साथ देव, शास्त्र और गुरु की रक्षा का संकल्प भी लिया और जैन समाज के 700 मुनियों पर आए भयंकर उपसर्ग के दिवस पर एकदूसरे को रक्षासूत्र बांधकर दो लाख से अधिक श्रीफल से सामूहिक महाअर्ध्य समर्पित कर श्रमण संस्कृति रक्षा दिवस धूमधाम से मनाया। इस दौरान बार-बार रक्षावंदन और श्रमण संस्कृति के जयघोष से समूचा पांडाल गुंजायमान बना रहा। शहर के इतिहास में पहली बार इतने विशाल स्तर पर रक्षाबंधन महामहोत्सव विधान का भक्ति और श्रद्धा से भरपूर अनुष्ठान देखने को मिला।
सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में आयोजित इस दिव्य आयोजन में देशभर से आए करीब 10 हजार समाज बंधु सभा मंडप में सुबह 6 बजे से ही जमा होने लगे थे। समूचा मंडप केशरिया साड़ी में मातृशक्ति और श्वेत परिधान में पुरुषों से खचाखच भरा नजर आ रहा था। आयोजन समिति की ओर से चक्रवर्ती परिवार के मनीष-सपना गोधा, नवीन-शिवानी गोधा, अशोक-रानी डोसी, हर्ष-तृप्ति जैन, श्राविकाश्रेष्ठी आशारानी-महेंद्र पांड्या, रमेश जैन निर्वाणा, सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद-अंतिका गोधा, धर्मेन्द्र जैन आदि ने सभी साधकों की अगवानी की। इस मौके पर गौतम-गिरीश जैन, रमेश-संजय सामरिया, आकाश जैन, सौरभ-सलिल बडजात्या, अक्षय कासलीवाल तथा मुख्य संयोजक भूपेंद्र जैन एवं विपुल बांझल ने सभी व्यवस्थाएं संभाली और साधकों को इस अनुष्ठान की प्रक्रिया समझाई। यह अनूठा दृश्य इंदौर के धार्मिक और आध्यात्मिक जगत में पहली बार देखने को मिला। समूचा पांडाल लगभग दो लाख से अधिक श्रीफलों से भर गया। रक्षाबंधन के पावन पर्व पर हजारों श्रद्धालुओं ने एक साथ बैठकर विधान किया और राष्ट्रसंत के चरणों में अपनी आस्था व्यक्त की। दलाल बाग में आज का नजारा शहर के लोगों को लम्बे समय तक याद रहेगा।
राष्ट्रसंत सुधासागर म.सा. के पावन सानिध्य में सबसे पहले अभिषेक एवं शांतिधारा के पश्चात पाद प्रक्षालन का क्रम प्रारम्भ हुआ। मंगलाचरण के बाद शास्त्रोक्त विधान से रक्षाबंधन पूजन एवं मुनिराज आराधना के बाद सामूहिक रक्षाबंधन का अनूठा आयोजन प्रारम्भ हुआ। तदपश्चात वात्सल्य सूत्र का दिव्य आयोजन शुरू हुआ जिसमें 10 हजार से अधिक समाज बंधुओं ने एकदूसरे को वत्सलत सूत्र बांधे। इसके पूर्व बालब्रह्मचारी प्रदीप भैया, पारस भैया और अमित सिंघई के निर्देशन में प्रत्येक परिवार के 7 सदस्यों ने 700 श्रीफल से 700 मुनियों के उपसर्ग दिवस के उपलक्ष्य में उनके प्रति कृतज्ञता स्वरुप श्रीफल से सामूहिक अर्ध्य समर्पित किया।
इस ऐतिहासिक आयोजन में अनुष्ठान से जुड़े प्रिंसपाल टोंग्या, गिरीश गिन्नी, शरद पानोत, विजय दुर्रा, आशीष जैन, मुकेश गोधा, भूपेंद्र भोपाली, राहुल जैन, विवेक जैन एवं विजय जैन सहित बड़ी संख्या में आयोजन समिति के पदाधिकारियों ने पूरे समय अनुष्ठान की व्यवस्थाएं संभाली। राष्ट्रसंत सुधासागर म.सा. ने अपने आशीर्वचन में रक्षाबंधन की पृष्ठभूमि में जैन धर्म के इतिहास एवं आध्यात्मिक महत्व को विस्तार से समझाया। उन्होंने आचार्य अकम्पनाचार्य सहित 700 मुनिराजों पर आए भयंकर उपसर्ग का भावपूर्ण प्रसंग सुनाते हुए कहा कि रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के प्रेम का पर्व नहीं बल्कि धर्म, साधु-संतों और श्रमण संस्कृति की रक्षा का भी संकल्प पर्व है।
राष्ट्रसंत ने एक कथा के माध्यम से मौन, संयम, क्षमा, अहंकार और कषाय का सन्देश देते हुए कहा कि जीवन में कभी भी ईगो पॉइंट और प्रेस्टीज पॉइंट नहीं बनाना चाहिए। परिवार में पति-पत्नी, माता-पिता और बच्चों के बीच अथवा समाज में यदि व्यक्ति अपनी प्रतिष्ठा और अहंकार को सबसे ऊपर रखता है तो सम्बन्धों में दरार आ ही जाती है। इस स्थिति में याद रखें कि हर लड़ाई जीतना जरुरी नहीं है। कई लड़ाइयाँ ऐसी होती हैं जिनमें उनसे दूर रहना ही सबसे बड़ी जीत होती है। दुष्टता का जवाब दुष्टता से नहीं, संयम और विवेक से देना चाहिए। इस दौरान सभामंडप रक्षावंदन करो-रक्षावंदन करो और श्रमण संस्कृति के जयघोष से गुंजायमान होता रहा। पर्यूषण महापर्व पर 15 सितम्बर से श्रावक संस्कार शिविर का आयोजन भी होगा जिसके लिए पंजीयन प्रारम्भ हो गए हैं। दलाल बाग पर प्रतिदिन सुबह 8 से 9.30 बजे तक राष्ट्रसंत की अमृत वर्षा का क्रम जारी है।
