
दलाल बाग स्थित विद्या-सुधा मंडप में देश-विदेश से आए 10 हजार श्रावकों की मौजूदगी में राष्ट्रसंत ने समझाया विनम्रता का महत्व
इंदौर फल से लदा वृक्ष हमेशा झुका हुआ रहता है जबकि खाली वृक्ष अकड़ा हुआ नजर आता है। मनुष्य जीवन की सार्थकता यही है कि वह जितना बड़ा बनता जाता है, उसके अंदर उतनी अधिक विनम्रता भी आना चाहिए। हम जीवन में स्वयं तो सम्मान चाहते हैं लेकिन दूसरों को सम्मान देने के लिए भी हमें तैयार रहना चाहिए। हम चाहते हैं कि लोग हमारी बातें सुनें लेकिन चिंतन करें कि क्या हम दूसरों की बात सुनने की विनम्रता रखते हैं। मार्दव धर्म हमें अपने भीतर झाँकने और व्यवहार में विनम्रता लाने की शिक्षा देता है। जहाँ अहंकार होता है वहां रिश्ते कमजोर हो जाते हैं और जहाँ विनम्रता होती है वहां आपस में प्रेम बढेगा।
सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में वीआईपी रोड स्थित किला मैदान, दलाल बाग परिसर में निर्मित विद्या-सुधा मंडप में चल रहे चातुर्मास महोत्सव की धर्मसभा में संत शिरोमणि प.पू. विद्यासागर म.सा. के परम प्रभावक शिष्य और राष्ट्रसंत मुनि पुंगव प.पू. श्री सुधासागर महाराज ने गुरुवार को पर्युषण महापर्व के दूसरे दिन उत्तम मार्दव धर्म की व्याख्या करते हुए उक्त दिव्य और प्रेरक विचार व्यक्त किए। धर्मसभा में प्रमुख रूप से चक्रवर्ती अध्यक्ष नवीन गोधा, सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद गोधा, शिविर के पुण्यार्जक आकाश जैन कोयला परिवार तथा महामंत्री हर्ष जैन, मनीष गोधा आदि ने देशभर से आए 10 हजार से अधिक शिविरार्थियों की आत्मीय अगवानी की। सभा का शुभारंभ मंगलाचरण एवं पाद प्रक्षालन के साथ हुआ। इस अवसर पर महोत्सव अध्यक्ष अशोक डोसी, प्रिंसपाल टोंग्या, संजय पाटोदी, हुकमचंद जैन काका, प्रदीप ब्रह्मचारी, विनोद भैया, विजय दुर्रा, सौरभ बडजात्या, राहुल सेठी, भूपेंद्र भोपाली, सोनाली बागडिया एवं अर्चना गोधा सहित अनेक सहयोगी बंधुओं ने विभिन्न व्यवस्थाओं में सहयोग प्रदान किया। दलाल बाग पर प्रतिदिन सुबह 8 से 9.30 बजे तक राष्ट्रसंत के प्रवचनों की अमृत वर्षा का क्रम जारी है।
श्रावक संस्कार शिविर में उमड़ा समाज बंधुओं का सैलाब– शिविर के प्रमुख पुण्यार्जक चक्रवर्ती आकाश-आलोक जैन कोयला, चातुर्मास के चक्रवर्ती मनीष-सपना गोधा, नवीन-शिवानी गोधा, आनंद-अंतिका गोधा एवं सकल दिगंबर जैन धर्म प्रभावना समिति के महामंत्री हर्ष जैन ने बताया कि पर्यूषण महापर्व के दूसरे दिन गुरुवार को भी शिविर में 10 हजार से अधिक समाज बंधुओं की मौजूदगी बनी रही। प्रवचन के दौरान अनेक अवसरों पर राष्ट्रसंत, जिनवाणी एवं जिनशासन के साथ महावीर स्वामी के जयघोष एवं हर्षध्वनि के दृश्य भी देखने, सुनने को मिले। धर्मसभा के समापन पर राष्ट्रसंत के आह्वान पर श्रद्धालुओं ने संकल्प लिया कि वे अपने पद, धन, विद्या और प्रतिष्ठा का अहंकार नहीं करेंगे, गुणवानों का सम्मान करेंगे, स्वयं विनम्र बनने का प्रयास करेंगे तथा अपने व्यवहार से परिवार को समाज में प्रेम, एकता और संस्कारों को बढ़ावा देंगे।
राष्ट्रसंत प.पू. सुधासागर म.सा. ने धर्मसभा में श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि वे अहंकार त्याग कर विनम्रता को अपनाएं और आत्म चिन्तन करें कि हमारे मन से अहंकार, मान और श्रेष्ठता के भाव कैसे समाप्त होंगे। उन्होंने श्रद्धालुओं से पूछा कि हम जीवन में स्वयं सम्मान तो चाहते हैं लेकिन क्या दूसरों को सम्मान देने के लिए तैयार हैं? हम चाहते हैं कि लोग हमारी बात सुनें पर क्या हम दूसरों की बात सुनने की विनम्रता रखते हैं? मान से दूरी पैदा होती है जबकि मार्दव से आत्मीयता और शांति का जन्म होता है। याद रखें कि भगवान बनने की यात्रा अहंकार से नहीं विनय से शुरू होती है। पहले गुरु के सामने, फिर माता-पिता के सामने, फिर गुणवानों के सामने झुकना और अंततः अपने भीतर बैठे अहंकार को झुकाना सीखना होगा। जो व्यक्ति झुकना सीख जाता है, वही वास्तव में ऊँचा उठने के योग्य बनता है। उत्तम मार्दव धर्म एक ऐसे समाज की प्रेरणा देता है जहाँ पद से नहीं, विनय से सम्मान मिलता है। धन से नहीं गुणों से पहचान बनती है और अहंकार से नहीं सेवा व संस्कार से नेतृत्व क्षमता का सृजन होता है। झुकना कमजोरी नहीं, महानता की पहचान होती है।
