
दलाल बाग पर सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में चल रही चातुर्मासिक धर्मसभा में आशीर्वचन
इंदौर, हम अपने जीवन की दिशा, धर्म के वास्तविक स्वरुप और त्याग की सार्थकता पर भी चिंतन करें। मनुष्य जीवनभर संसार और धर्म के बीच भटकता रहता है लेकिन यह निर्णय नहीं कर पाता कि उसे वास्तव में जाना कहाँ है। यदि मोक्ष की ओर जाना है तो उसका मार्ग चुनें, और यदि संसार में रहना है तो उसका निर्णय करे लेकिन जीवन को बिना दिशा तय करे मत चलाइए। धर्म वह है जो हमारी दृष्टि बदले और त्याग वह है जो हमारी आसक्ति घटाए। उपवास वह है जो संयम बढाए और दान वह है जिसमें प्रतिफल की अपेक्षा न हो।
ये दिव्य विचार हैं संत शिरोमणि प.पू. विद्यासागर म.सा. के परम प्रभावक शिष्य और राष्ट्रसंत मुनि पुंगव प.पू. श्री सुधासागर महाराज के, जो उन्होंने सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में वीआईपी रोड स्थित किला मैदान, दलाल बाग परिसर में निर्मित विद्या-सुधा मंडप में चल रहे चातुर्मास महोत्सव में आयोजित नियमित धर्मसभा में उपस्थित देशभर से आए साधकों को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। सभा का शुभारंभ मंगलाचरण और पाद प्रक्षालन के साथ हुआ। देशभर से आए साधकों एवं अन्य श्रेष्ठिजनों की अगवानी चक्रवर्ती अध्यक्ष नवीन गोधा, सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद गोधा, मनीष गोधा, महोत्सव अध्यक्ष अशोक डोसी, महामंत्री हर्ष जैन, सुनील भैया, प्रिंसपाल टोंग्या, संजय पाटोदी, संजय सामरिया, हुकमचंद जैन काका, गिरीश जैन गिन्नी, धर्मेन्द्र जैन, प्रदीप ब्रह्मचारी, विनोद भैया, विजय दुर्र, सौरभ बडजात्या, राहुल सेठी एवं भूपेंद्र भोपाली सहित अनेक सहयोगी बंधुओं ने की।
राष्ट्रसंत ने धर्मसभा में कहा कि मनुष्य कभी मन्दिर जाता है, कभी संसार में रम जाता है। कभी माला फेरता है तो कभी धन गिनने में लग जाता है। कभी दान करता है तो कभी भोग में लिप्त हो जाता है। इस प्रकार जीवन का बड़ा हिस्सा निर्णय के आभाव में बीत जाता है और जीवन के अंतिम समय में व्यक्ति स्वयं से पूछता है – मैंने जीवन में पाया क्या? यदि उत्तर केवल भटकाव है तो यह गंभीर आत्म चिंतन का विषय है। त्याग वस्तु का नहीं आसक्ति का होना चाहिए। यदि वस्तु छोड़ने के बाद भी मन उसी की ओर आकर्षित होता रहे तो व्यक्ति को अपने भीतर झांकना चाहिए। सच्चा त्याग तब है जब वस्तु के साथ-साथ उसके प्रति आसक्ति भी समाप्त हो जाए। यदि किसी के मुंह में नमक रखा हुआ हो तो उसे शकर का स्वाद कैसे आएगा। इसी तरह यदि मनुष्य अपने भीतर मोह, ममता, लालसा, अहंकार और विषयों की आसक्ति को बिठाए रखेगा तो मंदिर जाकर पूजा, अभिषेक या व्रत करने से कैसे लाभ मिलेगा। धर्म का आनंद ऐसे व्यक्ति को नहीं मिल सकेगा क्योंकि दोष धर्म में नहीं हमारे अंदर छिपी हुई आसक्ति में होता है।
